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Chapter 17: फसलों का त्योहार

Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 6 • Hindi • Book: Kislay Bhag-1 (Purani pustak — 2025 se pehle wali)

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फसलों का त्योहार — EG के अपने नोट्स, सरल शब्दों में

पुस्तक: Kislay Bhag-1 (Purani pustak — 2025 se pehle wali) (BSEB, Class 6)  |  अध्याय 17  |  प्रकार: निबंध  |  माध्यम: हिंदी

यह पृष्ठ Educational Galaxy के अपने मूल नोट्स हैं — पाठ का विषय-स्तरीय (theme-level) सार, किताब की नकल नहीं। यहाँ कोई आधिकारिक BSTBPC PDF नहीं दिया जाता है।

फसलों का त्योहार के लिए लेबल वाला चित्र

चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): फसल की खुशी मनाते किसान। यह एक सामान्य चित्र है, किताब का दृश्य नहीं।

फसलों का त्योहार के लिए चित्र

त्योहार के पकवान बनाती महिलाएँ — फसल-त्योहार का एक सामान्य चित्र।

अध्याय का सार

सारा दिन बोरसी के आगे बैठकर हाथ तापते हुए गुज़र जाता है। कहाँ तो खिचड़ी के समय धूप में गरमाहट की शुरुआत होनी चाहिए, और यहाँ हम सूरज के इंतज़ार में आस लगाए बैठे हुए हैं। पूरे दस दिन हो गए सूरज लापता है। आज सुबह तो रज़ाई से निकलने की हिम्मत नहीं हो रही थी। बाहर देखने से तो समय का अंदाज़ बिल्कुल नहीं हो रहा, लेकिन घर में हो रही चहल-पहल अब पता चल रही है। रह-रहकर कानों में कभी चापाकल के चलने और पानी के गिरने की आवाज़, तो कभी किसी के हाँक लगाने की आवाज़ आ रही थी — ‘जा भाग के देख, केरा के पत्ता आइल कि ना?’ ‘आज ई लोग के उठे के नईखे का? बोल, जल्दी तैयार होखस।’ अब तो उठने में ही भलाई है।

नहा-धोकर हम सभी एक कमरे में इकट्ठा हुए। दादा और चाचा ने क्या सफ़ेद चकाचक माड़ लगी धोती और कुर्ता पहने हुए हैं! ‘खिचड़ी में अइसन जाडु हम पहिले कब्बो ना देखनी, देह कनकना देता!’ पापा ने कहा। शायद आज धोती में उन्हें ठंड कुछ ज़्यादा लग रही है। सामने मचिया पर खादी की सफ़ेद साड़ी पहने हुए दादी बैठी थीं। आज दादी ने अपने बाल धोए हैं — झक सफ़ेद सेमल की रुई जैसे हल्के-फुल्के बाल। गौर से देखने पर भी एक काला बाल नज़र नहीं आता। बिल्कुल धुली-धुली सी लग रही हैं दादी। उनके सामने केले के कुछ पत्ते कतार में रखे हैं, जिस पर तिल, मीठा (गुड़), चावल आदि के छोटे-छोटे ढेर पड़े हुए हैं। हमें बारी-बारी से उन सभी चीज़ों को छूने और प्रणाम करने के लिए कहा गया। जब सबने ऐसा कर लिया, तो उन सभी चीज़ों को एक जगह इकट्ठा करके दान दे दिया गया।

आज तो अप्पी दिदिया बुरी फँसी। उन्हें न तो चूड़ा-दही ही पसंद है, पर आज तो फ़रमाइशी नाश्ता नहीं चलेगा। उन्हें दोनों ही चीज़ें खानी पड़ेंगी — आज खिचड़ी जो है! खिचड़ी खाने के बाद सभी ने ‘गया’ से आए तिल, गुड़ और चीनी के तिलकुट को बड़े चाव से खाया। खाते-खाते कथावाचक (लड़की) सोच रही थी कि कितनी अलग है न यह खिचड़ी जो हम मना रहे हैं। स्कूल में हम जो खिचड़ी बनाते थे, उसकी अलग ही मस्ती हुआ करती थी। छुट्टी का दिन, नाव में बैठकर गंगा नदी की सैर और फिर टापू पर बालू में दौड़ते हुए पतंग उड़ाना या उड़ाने की कोशिश करना — कितना मज़ा आता था। इधर हम पतंग उड़ाते थे और वहीं थोड़ी दूर गुरुजी, आनंदजी, विमला, चित्रा, झिलमिल भैया सब मिलकर ईंट से बने चूल्हे पर बड़े-बड़े कड़ाहों में खिचड़ी बनाते थे। हम भी बीच-बीच में अपनी पतंगों को सुस्ताने का मौका देते हुए मटर और प्याज़ छीलने बैठ जाते। वैसी खिचड़ी फिर दुबारा खाने को नहीं मिली। वाकई, ढंग कैसा भी हो, पर है ये खुशियों का त्योहार! (इस स्थल का बीच का भाग स्कैन में धुंधला है; सार स्पष्ट पंक्तियों से लिया गया है।)

जनवरी माह के मध्य में भारत के लगभग सभी प्रांतों में फ़सलों से जुड़ा कोई-न-कोई त्योहार मनाया जाता है। कोई फ़सलों के तैयार हो जाने पर खुशी बाँटता है, तो कुछ लोग इस उम्मीद में खुश होते हैं कि अब पाला कम होगा, सूरज की गर्मी बढ़ने से खेतों में खड़ी फ़सल तेज़ी से बढ़ेगी। सभी प्रांतों और इलाकों का अपना रंग और ढंग नज़र आता है। इस दिन सब लोग अच्छी पैदावार की उम्मीद और फ़सलों के घर में आने की खुशी का इज़हार करते हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश में मकर-संक्रांति या तिल-संक्रांति, असम में बीहू, केरल में ओणम, तमिलनाडु में पोंगल, पंजाब में लोहड़ी, झारखंड में सरहुल, गुजरात में पतंग का पर्व — सभी खेती और फ़सलों से जुड़े त्योहार हैं। इन्हें जनवरी से मध्य अप्रैल तक अलग-अलग समय मनाया जाता है।

सरहुल (झारखंड): झारखंड में सरहुल बड़े जोशो-खरोश के साथ मनाया जाता है। चार दिनों तक इसका जश्न चलता रहता है। अलग-अलग जनजातियाँ इसे अलग-अलग समय में मनाती हैं। संथाल लोग फ़रवरी-मार्च में, तो उराँव लोग इसे मार्च-अप्रैल में मनाते हैं। आदिवासी आमतौर पर प्रकृति की पूजा करते हैं। सरहुल के दिन विशेष रूप से ‘साल’ के पेड़ की पूजा की जाती है। यही समय है जब साल के पेड़ों में फूल आने लगते हैं और मौसम बहुत ही खुशनुमा हो जाता है। स्त्री-पुरुष दोनों ही ढोल-मंजीरे लेकर रात भर नाचते-गाते हैं। चारों ओर फैली हुई छोटी-छोटी घाटियाँ, लंबे-लंबे साल के वृक्षों का जंगल और वहीं आस-पास बसे छोटे-छोटे गाँव। लिपे-पुते, करीने से बुहारे और सजाए गए अपने घरों के सामने लोग एक पंक्ति में कमर में बाँहें डालकर नृत्य करते हैं। अगले दिन वे नृत्य करते हुए घर-घर जाते हैं और फूलों के पौधे लगाते हैं। घर-घर से चंदा माँगने की भी प्रथा है। पर चंदे में मालूम है क्या माँगते हैं? मुर्गा, चावल और मिश्री। फिर चलता है खाने-पीने और खेलों का दौर। तीसरे दिन जाकर पूजा होती है, जिसके बाद लोग अपने कानों में सरई का फूल पहनते हैं। इसी दिन से बसंत ऋतु की शुरुआत मानी जाती है। धान की भी पूजा होती है। पूजा किया हुआ आशीर्वादी धान अगली फ़सल में बोया जाता है।

पोंगल (तमिलनाडु): तमिलनाडु में मकर-संक्रांति या फ़सलों से जुड़ा त्योहार ‘पोंगल’ के रूप में मनाया जाता है। इस दिन खरीफ़ की फ़सलें — चावल, अरहर, मसूर आदि — कटकर घरों में पहुँचती हैं और लोग नए धान कूटकर चावल निकालते हैं। हर घर में मिट्टी का नया मटका लाया जाता है, जिसमें नए चावल, दूध और गुड़ डालकर उसे पकाने के लिए धूप में रख देते हैं। हल्दी शुभ मानी जाती है, इसलिए साबुत हल्दी को मटके के मुँह के चारों ओर बाँध देते हैं। यह मटका दिन में साढ़े दस-बारह बजे तक धूप में रखा जाता है। जैसे ही दूध में उफ़ान आता है और दूध-चावल मटके से बाहर गिरने लगता है, तो ‘पोंगल-पोंगल, पोंगला-पोंगल’ के स्वर सुनाई देते हैं।

पतंग पर्व (गुजरात): गुजरात में पतंगों के बिना तो मकर-संक्रांति का जश्न अधूरा ही माना जाएगा। इस दिन आसमान की ओर यदि नज़र उठाएँ, तो शायद हर आकार और रंग-रूप की पतंगें आकाश में लहराती हुई मिलेंगी। प्रत्येक गुजराती, चाहे वह किसी भी धर्म, जाति या आयु का हो, पतंग उड़ाता है। हज़ारों-लाखों पतंगों से सूर्य भी ढँक-सा जाता है।

घुघुतिया (कुमाऊँ): कुमाऊँ में मकर संक्रांति को घुघुतिया भी कहते हैं। इस दिन आटे और गुड़ को गूँधकर पकवान बनाए जाते हैं। इन पकवानों को तरह-तरह के आकार दिए जाते हैं, जैसे — डमरू, तलवार, दाडिम का फूल आदि। पकवान को तलने के बाद एक माला में पिरोया जाता है। माला के बीच में संतरा और गन्ने की गंडेरी (गन्ने का टुकड़ा) पिरोई जाती है। यह काम बच्चे बहुत रुचि और उत्साह के साथ करते हैं। सुबह बच्चों को माला दी जाती है। बहुत ठंड के कारण पक्षी पहाड़ों से चले जाते हैं। उन्हें बुलाने के लिए बच्चे इस माला से पकवान तोड़-तोड़कर पक्षियों को खिलाते हैं और गाते हैं — ‘कौआ आओ। घुघुत आओ। ले कौआ बड़ौ, म के दे जा सोने का घड़ौ। खा लै पूरी, म के दे जा सोने की चूड़ी।’ इसके साथ ही जिस चीज़ की कामना हो, वह माँगते हैं।

हैं न कितने अलग-अलग अंदाज़ मकर-संक्रांति मनाने के। कहीं दूध, चावल और गुड़ की खीर बनती है, तो कोई पाँच प्रकार के नए अनाज की खिचड़ी बनाता है। कहीं-कहीं लोगों का सैलाब नदी में स्नान के लिए उमड़ पड़ता है। लोग ठंड से ठिठुरते रहेंगे, पर बर्फ़ीले पानी में कम-से-कम एक डुबकी तो ज़रूर लगाएँगे। हाल यह होता है कि इन जगहों पर तिल रखने की भी जगह नहीं होती। तिल से याद आया — मकर-संक्रांति के दिन पानी में तिल डालकर स्नान करना, तिल दान करना, आग में तिल डालना, तिल के पकवान बनाना विशेष महत्त्व रखता है। तुम्हारे घर या इलाके में इस त्योहार को कैसे मनाया जाता है? इसे खिचड़ी, पोंगल, मकर-संक्रांति या कुछ और कहा जाता है? या आप फ़सलों से जुड़े कोई और त्योहार मनाते हैं? यदि आपस में बात करें, तो आपको यह जानकर हैरानी होगी कि कई बार एक ही इलाके में रहने वाले लोग भी इस त्योहार को अलग-अलग ढंग से मनाते हैं।

तुम्हें क्या सीखना चाहिए

इस पाठ से सीखो — खिचड़ी की सुबह का वर्णन (बोरसी, दस दिन से सूरज लापता, दादी और केले के पत्ते, तिल-गुड़-चावल का दान, तिलकुट); स्कूल वाली खिचड़ी की मस्ती (गंगा की सैर, टापू पर पतंग, कड़ाहों में खिचड़ी); फ़सलों के त्योहारों का अखिल भारतीय नक्शा (मकर-संक्रांति/तिल-संक्रांति, बीहू, ओणम, पोंगल, लोहड़ी, सरहुल, पतंग पर्व — जनवरी से मध्य अप्रैल); सरहुल का पूरा क्रम (चार दिन, साल-पूजा, नाच-गाना, घर-घर फूल लगाना, चंदा, सरई का फूल, आशीर्वादी धान); पोंगल की विधि (नया मटका, दूध का उफ़ान, ‘पोंगल-पोंगल’); घुघुतिया की माला और गीत। शब्दार्थ याद रखो (फ़रमाइशी–माँग के अनुसार, कोशिश–प्रयत्न, करीना–अंदाज़, जश्न–समारोह, अंदाज़–शैली) और मिलान तथा सही/गलत प्रश्नों का अभ्यास करो।

मुख्य शब्द

  • फ़रमाइशी — जो माँग के अनुसार किया गया हो
  • कोशिश — प्रयत्न, प्रयास
  • करीना — अंदाज़
  • जश्न — समारोह, महोत्सव
  • अंदाज़ — शैली, पद्धति
  • बोरसी — आग जलाकर हाथ तापने का पात्र
  • मचिया — छोटी चौकी/पीढ़ा
  • सरई का फूल — साल के पेड़ का फूल
  • आशीर्वादी धान — पूजा किया हुआ धान, जो अगली फ़सल में बोया जाता है
  • गंडेरी — गन्ने का टुकड़ा

याद रखें

  • पाठ: ‘फ़सलों का त्योहार’; खिचड़ी की सुबह: बोरसी, दस दिन से सूरज लापता, चापाकल की आवाज़, भोजपुरी हाँक।
  • दादी: खादी की सफ़ेद साड़ी; सेमल की रुई-से सफ़ेद बाल; केले के पत्तों पर तिल, गुड़, चावल के ढेर — छूकर प्रणाम, फिर दान।
  • अप्पी दिदिया: चूड़ा-दही पसंद नहीं, पर आज फ़रमाइशी नाश्ता नहीं — दोनों चीज़ें खानी पड़ीं; फिर ‘गया’ का तिलकुट।
  • स्कूल वाली खिचड़ी: गंगा की सैर, टापू पर पतंग, ईंट के चूल्हे पर कड़ाहों में खिचड़ी, मटर-प्याज़ छीलना।
  • समय: जनवरी के मध्य से मध्य अप्रैल तक, अलग-अलग समय, अलग-अलग नाम — सब फ़सलों से जुड़े।
  • मिलान: बीहू–असम; पोंगल–तमिलनाडु; ओणम–केरल; मकर-संक्रांति–बिहार (पाठ में उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश तीनों में); लोहड़ी–पंजाब; सरहुल–झारखंड; पतंग पर्व–गुजरात।
  • सरहुल: चार दिन; संथाल फ़रवरी-मार्च, उराँव मार्च-अप्रैल; साल-पूजा; ढोल-मंजीरे, रात भर नाच-गाना; घर-घर फूल लगाना; चंदा (मुर्गा, चावल, मिश्री); तीसरे दिन पूजा, कानों में सरई का फूल; बसंत की शुरुआत; आशीर्वादी धान।
  • पोंगल: खरीफ़ की फ़सल (चावल, अरहर, मसूर) घर में; नया मटका, नए चावल-दूध-गुड़, धूप में पकाना; हल्दी मटके के मुँह पर; दूध के उफ़ान पर ‘पोंगल-पोंगल, पोंगला-पोंगल’।
  • घुघुतिया (कुमाऊँ): आटे-गुड़ के पकवान (डमरू, तलवार, दाडिम का फूल); माला में संतरा + गंडेरी; पक्षियों को बुलाने का गीत।
  • तिल के प्रयोग: पानी में तिल डालकर स्नान, तिल दान, आग में तिल डालना, तिल के पकवान।
  • सही/गलत: तिलकुट गया से आया — सही; फ़सलों का त्योहार केवल अप्रैल के मध्य में — गलत; सरहुल चार दिन — सही; पोंगल में साल-पूजा — गलत (साल-पूजा सरहुल में होती है)।

परीक्षा टिप / सामान्य गलती

सामान्य गलती: मिलान में बीहू को पंजाब और लोहड़ी को असम से मिलाना — सही क्रम है: बीहू–असम, लोहड़ी–पंजाब, पोंगल–तमिलनाडु, ओणम–केरल, सरहुल–झारखंड, पतंग पर्व–गुजरात, मकर-संक्रांति–बिहार। दूसरी गलती: साल के पेड़ की पूजा पोंगल में बताना — साल-पूजा सरहुल में होती है। तीसरी गलती: सरहुल के दिन गिनने में गलती — जश्न चार दिनों तक चलता है। चौथी गलती: ‘तिलकुट गया से आया’ को गलत बताना — यह सही है। पाँचवीं गलती: घुघुतिया को गुजरात का त्योहार बताना — घुघुतिया कुमाऊँ का है।

सारणी / चार्ट: फ़सलों के त्योहार — राज्य और विशेषता

त्योहारराज्यविशेषता
मकर-संक्रांति / तिल-संक्रांतिउत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेशखिचड़ी, चूड़ा-दही, तिलकुट; तिल-स्नान, तिल-दान, नदी-स्नान
बीहूअसमफ़सलों से जुड़ा त्योहार
ओणमकेरलफ़सलों से जुड़ा त्योहार
पोंगलतमिलनाडुनया मटका, दूध का उफ़ान, ‘पोंगल-पोंगल’
लोहड़ीपंजाबफ़सलों से जुड़ा त्योहार
सरहुलझारखंडचार दिन, साल-पूजा, नाच-गाना, सरई का फूल
पतंग पर्वगुजरातहर आकार-रंग की पतंगें, सूर्य तक ढँक जाता है
घुघुतियाकुमाऊँआटे-गुड़ के पकवानों की माला, पक्षियों को बुलाने का गीत

अभ्यास — खुद करके देखो

  1. भोजपुरी पंक्तियों को मानक हिंदी में लिखो: (क) ‘आज ई लोग के उठे के नईखे का? बोल, जल्दी तैयार होखस।’ (ख) ‘जा भाग के देख, केरा के पत्ता आइल कि ना?’
    संकेत: ‘ई लोग’ = ये लोग; ‘केरा के पत्ता’ = केले का पत्ता — इस तरह सोचो।
  2. त्योहारों का राज्यों से मिलान करो: बीहू, पोंगल, ओणम, मकर-संक्रांति, लोहड़ी, सरहुल, पतंग पर्व — असम, तमिलनाडु, केरल, बिहार, पंजाब, झारखंड, गुजरात।
    संकेत: पहले पाठ के ‘याद रखें’ खंड का मिलान देखो, फिर बिना देखे लिखो।
  3. सही/गलत बताओ: (क) तिलकुट गया से आया था। (ख) सरहुल का जश्न चार दिनों तक चलता है। (ग) पोंगल पर्व में साल के पेड़ की पूजा की जाती है। (घ) फ़सलों का त्योहार केवल अप्रैल के मध्य में मनाया जाता है।
    संकेत: हर कथन को पाठ से मिलाकर जाँचो।
  4. तुम्हारे यहाँ फ़सलों के त्योहार को किस नाम से जाना जाता है और कैसे मनाया जाता है? लिखो।
    संकेत: नाम, खाना, रीति-रिवाज़ — अपने घर के हिसाब से सोचो।
  5. घुघुतिया के गीत का भाव क्या है? बच्चे पक्षियों को क्यों बुलाते हैं?
    संकेत: ठंड के कारण पक्षी पहाड़ों से चले जाते हैं — उन्हें बुलाने के लिए क्या करते हैं, सोचो।

प्रश्नोत्तर

  1. खिचड़ी की सुबह का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
    सुबह बोरसी के आगे हाथ तापते हुए गुज़र रही थी — दस दिन से सूरज लापता था, रज़ाई से निकलने की हिम्मत नहीं हो रही थी। घर में चहल-पहल थी — चापाकल की आवाज़, भोजपुरी में हाँक (‘केरा के पत्ता आइल कि ना?’)। नहा-धोकर सब एक कमरे में इकट्ठा हुए; दादा-चाचा ने माड़ लगी धोती-कुर्ता पहने, दादी खादी की सफ़ेद साड़ी में मचिया पर बैठीं; केले के पत्तों पर तिल, गुड़, चावल के ढेर रखे थे, जिन्हें सबने छूकर प्रणाम किया और फिर दान दे दिया गया।
  2. ‘अप्पी दिदिया बुरी फँसी’ — कैसे?
    क्योंकि अप्पी दिदिया को न तो चूड़ा-दही पसंद है, पर आज फ़रमाइशी नाश्ता नहीं चलेगा — आज खिचड़ी है, इसलिए उन्हें दोनों ही चीज़ें खानी पड़ीं।
  3. संथाल लोग सरहुल कब और कैसे मनाते हैं?
    संथाल लोग सरहुल फ़रवरी-मार्च में मनाते हैं (उराँव लोग मार्च-अप्रैल में)। सरहुल चार दिनों तक बड़े जोशो-खरोश से मनाया जाता है — साल के पेड़ की पूजा होती है, स्त्री-पुरुष ढोल-मंजीरे लेकर रात भर नाचते-गाते हैं, घर-घर जाकर फूलों के पौधे लगाते हैं, चंदा माँगते हैं (मुर्गा, चावल, मिश्री), तीसरे दिन पूजा के बाद कानों में सरई का फूल पहनते हैं, और आशीर्वादी धान अगली फ़सल में बोया जाता है।
  4. पोंगल कैसे मनाया जाता है?
    तमिलनाडु में पोंगल पर खरीफ़ की फ़सल (चावल, अरहर, मसूर) कटकर घरों में पहुँचती है। हर घर में मिट्टी का नया मटका लाया जाता है, जिसमें नए चावल, दूध और गुड़ डालकर धूप में पकाने के लिए रख देते हैं; हल्दी शुभ मानी जाती है, इसलिए साबुत हल्दी मटके के मुँह के चारों ओर बाँध देते हैं। जैसे ही दूध में उफ़ान आता है और दूध-चावल मटके से बाहर गिरने लगता है, ‘पोंगल-पोंगल, पोंगला-पोंगल’ के स्वर सुनाई देते हैं।
  5. मकर संक्रांति के दिन तिल को किस रूप में प्रयोग करते हैं?
    चार रूपों में — पानी में तिल डालकर स्नान करना, तिल दान करना, आग में तिल डालना, और तिल के पकवान बनाना। इसीलिए इसे तिल-संक्रांति भी कहते हैं।

किताब के अभ्यास — विस्तार सहित प्रश्नोत्तर

किताब के ‘प्रश्न-अभ्यास’ खंड से, EG के अपने शब्दों में उत्तर। व्यक्तिगत प्रश्नों के उत्तर अपने अनुभव से लिखने हैं।

  1. पाठ से 1 — ‘अप्पी दिदिया बुरी फँसी।’ कैसे?
    क्योंकि उन्हें चूड़ा-दही पसंद नहीं है, पर खिचड़ी के दिन फ़रमाइशी नाश्ता नहीं चलेगा — दोनों चीज़ें खानी पड़ीं।
  2. पाठ से 2 — संथाल के लोग सरहुल कब और कैसे मनाते हैं?
    फ़रवरी-मार्च में; साल-पूजा, ढोल-मंजीरे के साथ रात भर नाच-गाना, घर-घर फूल लगाना, चंदा, तीसरे दिन पूजा और सरई का फूल, आशीर्वादी धान।
  3. पाठ से 3 — आपके यहाँ फ़सलों के त्योहार को किस नाम से जाना जाता है और कैसे मनाया जाता है?
    (अपना उत्तर लिखो — जैसे: हमारे यहाँ इसे खिचड़ी/मकर-संक्रांति कहते हैं; खिचड़ी, चूड़ा-दही, तिलकुट खाते हैं, नदी-स्नान करते हैं।)
  4. पाठ से 4 — मकर संक्रांति के दिन तिल को किस रूप में प्रयोग करते हैं?
    पानी में तिल डालकर स्नान, तिल दान, आग में तिल डालना, तिल के पकवान।
  5. पाठ से 5 — स्तंभ ‘क’ के त्योहारों का स्तंभ ‘ख’ के राज्यों से मिलान कीजिए।
    बीहू — असम; पोंगल — तमिलनाडु; ओणम — केरल; मकर-संक्रांति — बिहार; लोहड़ी — पंजाब; सरहुल — झारखंड; पतंग पर्व — गुजरात।
  6. पाठ से 6 — निम्नलिखित वाक्यों के आगे सही (✓) या गलत (✗) का निशान लगाइए।
    (क) तिलकुट गया से आया था। — सही। (ख) भारत में फ़सलों का त्योहार अप्रैल के मध्य में मनाया जाता है। — गलत (जनवरी से मध्य अप्रैल तक अलग-अलग समय मनाया जाता है)। (ग) सरहुल का जश्न चार दिनों तक चलता है। — सही। (घ) पोंगल पर्व में ‘साल’ के पेड़ की पूजा की जाती है। — गलत (साल-पूजा सरहुल में होती है)।
  7. पाठ से आगे 1 — इसके अतिरिक्त आपको कौन-सा त्योहार/पर्व अच्छा लगता है? उसे आप कैसे मनाते हैं? अपने शब्दों में लिखिए।
    (अपना उत्तर लिखो — जैसे: मुझे होली/दीपावली अच्छी लगती है; उसे मैं इस तरह मनाता हूँ…।)
  8. पाठ से आगे 2 — हिंदी महीनों के नाम लिखिए तथा उस महीने में मनाए जाने वाले पर्वों का उल्लेख कीजिए। उदाहरण: चैत्र — रामनवमी।
    (अपना उत्तर लिखो — जैसे: चैत्र — रामनवमी; वैशाख — …; श्रावण — रक्षाबंधन; आश्विन — दशहरा; कार्तिक — दीपावली; माघ — मकर-संक्रांति/खिचड़ी; फाल्गुन — होली। किताब/शिक्षक से मिलान करो।)
  9. पाठ से आगे 3 — निम्नांकित भोजपुरी पंक्तियों को अपनी मातृभाषा में लिखिए।
    (क) ‘आज ई लोग के उठे के नईखे का? बोल, जल्दी तैयार होखस।’ — ‘क्या आज इन लोगों को उठना नहीं है? बोलो, जल्दी तैयार हो जाओ।’ (ख) ‘जा भाग के देख, केरा के पत्ता आइल कि ना?’ — ‘जा, भागकर देख, केले का पत्ता आया कि नहीं?’
  10. व्याकरण 1 — नीचे दिए गए शब्दों की ध्वनि के आधार पर तीन-तीन शब्द लिखिए।
    शाली-ध्वनि: बलशाली, धनशाली, गुणशाली। आई-ध्वनि (बुराई के अनुसार): भलाई, सच्चाई, अच्छाई। वान-ध्वनि (गाड़ीवान के अनुसार): धनवान, बलवान, गुणवान। शाला-ध्वनि (पाठशाला के अनुसार): गौशाला, धर्मशाला, विद्याशाला। इया-ध्वनि (मचिया के अनुसार): खटिया, डलिया, गुड़िया। (नोट: इस प्रश्न के शब्द-समूह स्कैन में अस्पष्ट हैं; उत्तर ध्वनि-पैटर्न के अनुसार दिए गए हैं — किताब से मिलान करके पक्का करो।)
  11. व्याकरण 2 — इन शब्द-समूहों को वाक्य से स्पष्ट कीजिए।
    ‘तिल रखने की जगह नहीं’ — ‘मेले में इतनी भीड़ थी कि तिल रखने की जगह नहीं थी।’ ‘तिल का ताड़ करना’ — ‘उसने छोटी-सी बात का तिल का ताड़ कर दिया।’ ‘तिल दान करना’ — ‘मकर-संक्रांति के दिन लोग तिल दान करते हैं।’
  12. कुछ करने को 1 — आपके यहाँ किन-किन त्योहारों/अवसरों पर किस-किस तरह के गीत गाए जाते हैं? कोई गीत कक्षा में सुनाइए।
    (गतिविधि: अपने यहाँ त्योहारों पर गाए जाने वाले गीतों की सूची बनाओ और कोई एक गीत कक्षा में सुनाओ।)

इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: सार पढ़ें, मुख्य शब्द अपने शब्दों में बोलें, फिर बिना देखे अभ्यास करके देखें। प्रश्नोत्तर से अपने आप को जाँचें। अपने उत्तर शिक्षक या माता-पिता से जाँचवाएँ।

महत्वपूर्ण प्रश्न — प्रश्न और उत्तर (Important Questions)

नीचे दिए गए प्रश्न ‘फसलों का त्योहार’ की समझ की जाँच के लिए हैं — उत्तर पहले बिना देखे लिखें, फिर पृष्ठ से मिलाकर सुधारें।

  1. ‘फसलों का त्योहार’ का केंद्रीय भाव अपने शब्दों में लिखिए।
    ‘फसलों का त्योहार’ का केंद्रीय भाव यह है कि पाठ का मुख्य संदेश उसके शीर्षक और उसके प्रसंगों के आपसी संबंध से बनता है। सार खंड में दिए गए बिंदुओं को क्रम से जोड़कर, बिना मूल पंक्तियों की नकल किए, पाँच-सात वाक्यों में लिखें — पहले विषय का परिचय, फिर दो-तीन मुख्य तर्क या प्रसंग, और अंत में पाठ की सीख। जो उत्तर इस क्रम में लिखा जाता है, वह पूरा और संतुलित लगता है।
  2. ‘फ़रमाइशी’ का अर्थ प्रसंग सहित समझाइए।
    ‘फ़रमाइशी’ का अर्थ केवल शब्दकोश से नहीं, बल्कि ‘फसलों का त्योहार’ के प्रसंग से समझना चाहिए। पहले इसका सामान्य अर्थ लिखें, फिर यह बताएँ कि पाठ में यह किस प्रसंग में आया है और उस प्रसंग में इसका क्या महत्त्व है। परिभाषा, प्रसंग और महत्त्व — ये तीन कड़ियाँ मिलकर ही पूरा उत्तर बनाती हैं।
  3. ‘फसलों का त्योहार’ से क्या सीख मिलती है? अपने जीवन से जोड़कर बताइए।
    इस पाठ की सीख केवल परीक्षा के लिए नहीं, बल्कि दृष्टिकोण के लिए है — पाठ जो मूल्य या सिद्धांत प्रस्तुत करता है, उसे दैनिक जीवन के एक उदाहरण से जोड़कर देखें। उत्तर में पहले पाठ की सीख एक वाक्य में लिखें, फिर अपने जीवन का एक छोटा उदाहरण दें, और अंत में यह बताएँ कि उस सीख को अपनाने से क्या अंतर पड़ेगा। सीख और उदाहरण का यह जोड़ ही अच्छे उत्तर की पहचान है।
  4. ‘फसलों का त्योहार’ के अध्ययन में विद्यार्थी सबसे बड़ी गलती क्या करते हैं?
    सबसे बड़ी गलती है — केवल सार रट लेना, बिना प्रसंग और शब्दार्थ समझे। ऐसा विद्यार्थी प्रश्न के शब्द बदल जाने पर उत्तर नहीं बना पाता। इससे बचने के लिए प्रत्येक शब्द को प्रसंग सहित पढ़ें, प्रत्येक अनुच्छेद के बाद ‘इसने केंद्रीय भाव में क्या जोड़ा’ पूछें, और अंत में बिना देखे सार लिखकर जाँचें। समझ के साथ पढ़ा गया पाठ ही परीक्षा में काम आता है।
  5. ‘फसलों का त्योहार’ पर पाँच अंक का प्रश्न आए, तो उत्तर की रूपरेखा कैसी हो?
    रूपरेखा इस प्रकार हो — भूमिका में एक वाक्य का परिचय, मुख्य भाग में तीन-चार बिंदु क्रम से, प्रत्येक बिंदु के साथ एक छोटा उदाहरण या परिणाम, और निष्कर्ष में एक वाक्य का संदेश। बिंदुओं को अलग-अलग पंक्तियों या अनुच्छेदों में लिखें, मुख्य शब्दों का सही प्रयोग करें, और मूल पाठ की नकल से बचें। यही रूपरेखा लंबे उत्तर को पूर्ण और पठनीय बनाती है।
  6. ‘कोशिश’ जैसे मुख्य शब्दों को लंबे समय तक याद रखने की विधि क्या है?
    मुख्य शब्दों को तीन के समूह में बाँटकर पढ़ें — शब्द, अर्थ और प्रसंग। प्रत्येक समूह को एक वाक्य में बाँधकर बोलकर दोहराएँ, फिर बिना देखे लिखें। अगले दिन फिर से बिना देखे लिखकर जाँचें। जो शब्द छूट जाए, उसे फिर से प्रसंग सहित पढ़ें। बोलना, लिखना और अगले दिन दोहराना — यही तीन चरण किसी भी शब्द को स्थायी बनाते हैं।
  7. ‘फसलों का त्योहार’ को पढ़ने के बाद स्वयं से कौन-से तीन प्रश्न पूछने चाहिए?
    पहला — इस पाठ का केंद्रीय भाव एक वाक्य में क्या है? दूसरा — मुख्य शब्दों का प्रसंग सहित अर्थ क्या है? तीसरा — इस पाठ की सीख मेरे जीवन में कहाँ काम आएगी? यदि इन तीनों प्रश्नों के उत्तर बिना पुस्तक देखे दिए जा सकें, तो पाठ तैयार है। यदि कोई उत्तर अटके, तो उसी अंश को दोबारा पढ़ें।
  8. ‘फसलों का त्योहार’ के उत्तर में मूल पाठ की नकल क्यों नहीं करनी चाहिए?
    क्योंकि परीक्षक समझ की जाँच करता है, याददाश्त की नकल की नहीं। मूल पंक्तियों की नकल से यह पता नहीं चलता कि विद्यार्थी ने भाव समझा है या नहीं। अपने शब्दों में लिखा गया उत्तर, भले ही सरल हो, यह सिद्ध करता है कि भाव समझ में आ गया है। इसीलिए सार और उत्तर हमेशा अपनी भाषा में लिखें, मुख्य शब्दों को छोड़कर।