Chapter 14: डॉ. भीमराव अम्बेदकर
Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 6 • Hindi • Book: Kislay Bhag-1 (Purani pustak — 2025 se pehle wali)
डॉ. भीमराव अम्बेदकर — EG के अपने नोट्स, सरल शब्दों में
पुस्तक: Kislay Bhag-1 (Purani pustak — 2025 se pehle wali) (BSEB, Class 6) | अध्याय 14 | प्रकार: जीवनी | माध्यम: हिंदी
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साथ पढ़ते बच्चे — शिक्षा और समानता का एक सामान्य चित्र।
अध्याय का सार
संध्या हो रही है। पश्चिम दिशा में लाली फैल रही है। पक्षी चहचहाते हुए अपने घोंसलों की ओर लौट रहे हैं। बड़ौदा के राजमार्ग पर पेड़ के नीचे एक युवक बैठा है। वह फूट-फूटकर रो रहा है। आँसुओं का झरना लगातार झर रहा है। कोई धीरज नहीं देता उसे, कोई राह नहीं दिखाता उसे। अचानक वह उठ खड़ा हो जाता है। आँसू पोंछकर सोचता है — ‘मैं अछूत हूँ, यह पाप है। किसने बनायी है छुआछूत की व्यवस्था? किसने बनाया है किसी को नीच, किसी को ऊँच? भगवान ने? हर्गिज़ नहीं। वह ऐसा नहीं कर सकता। वह सबको समान रूप से जन्म देता है। यह बुराई मनुष्य ने पैदा की है। मैं इसे मिटाकर रहूँगा।’ कुछ निश्चय करता है और वह युवक मुंबई लौट आता है। फिर वह जो कुछ करता है, उसके कारण आज सारा देश ‘बाबा साहब’ के नाम से स्मरण करता है।
मध्यप्रदेश के महू नगर में रामजी सकपाल नाम के एक सूबेदार मेजर थे। वे महार जाति के थे। 14 अप्रैल सन् 1891 ई. को उनके घर चौदहवीं संतान ने जन्म लिया। उनकी अल्प आयु में ही माता भीमाबाई का देहांत हो गया। फिर चाची मीराबाई ने उसका पालन-पोषण किया। वे बालक को प्यार से ‘भीवा’ कहकर बुलाया करती थीं। बाद में यही बालक ‘भीमराव रामजी अम्बेडकर’ कहलाए। जिस वर्ष भीमराव का जन्म हुआ, उसी वर्ष रामजी नौकरी से छुट्टी पाकर रत्नागिरि के दपोली स्थान पर आ गए थे। यहीं भीमराव को पहली बार एक मराठी स्कूल में भर्ती कराया गया। चार वर्ष बाद वे पिता के साथ सतारा आ गए और सरकारी स्कूल में भर्ती हुए। सन् 1905 में रामाबाई नाम की कन्या से भीमराव की शादी हो गयी। उस समय वह नौ वर्ष की थी। शादी के बाद भीमराव अपने पिता के साथ मुंबई चले गए। वहाँ वे एलफ़िंस्टन स्कूल में भर्ती हुए। इस स्कूल में छुआछूत की कुप्रथा नहीं थी।
सन् 1907 में भीमराव ने मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की। महार जाति के लिए यह बहुत गौरव की बात थी। घर में खूब खुशियाँ मनायी गयीं। भीमराव एलफ़िंस्टन कॉलेज में पढ़ने लगे। बड़ौदा के महाराज सयाजीराव गायकवाड़ ने प्रसन्न होकर उन्हें 25 रुपये मासिक छात्रवृत्ति देना आरंभ कर दिया। सन् 1913 में वे बी.ए. उत्तीर्ण हो गए। महाराज ने उन्हें बड़ौदा बुलाया और दरबार में नौकरी दे दी। दुर्भाग्य से इसी वर्ष उनके पिता का स्वर्गवास हो गया। महाराज के दरबार में भीमराव को कट्टरपंथियों की घृणा का पात्र बनना पड़ा। चपरासी तक उनको फ़ाइलें फेंककर देते थे। तंग आकर भीमराव ने नौकरी छोड़ दी। वे फिर महाराज से छात्रवृत्ति पाने में सफल हुए और उच्च शिक्षा के लिए कोलंबिया (अमेरिका) चले गए। अपनी महार जाति के वे पहले विद्यार्थी थे, जिन्हें विदेश जाने का अवसर मिला। कोलंबिया विश्वविद्यालय में पढ़ते समय भीमराव को अनेक नए अनुभव हुए। वहाँ उन्हें सबका प्यार और समानता का व्यवहार मिला। उन्होंने डॉक्टरेट की उपाधि पायी। सन् 1916 में वे कोलंबिया से लंदन पहुँचे। वहाँ एक वर्ष रहकर वे मुंबई लौट आए। महाराज गायकवाड़ ने उनको सेना में सचिव के पद पर बड़ौदा बुला लिया, किंतु वहाँ फिर उनको घृणा का शिकार होना पड़ा। अधीनस्थ कर्मचारी उनसे घृणा करते थे। कार्यालय में उनको पीने के लिए पानी तक नहीं मिलता था। इस व्यवहार से उनका हृदय टूट गया। उन्होंने आँखों में आँसू भरकर नौकरी छोड़ दी और मुंबई जा पहुँचे।
विदेश में रहकर डॉ. अम्बेडकर ने दो पुस्तकें लिखीं। धीरे-धीरे उनकी विद्वता की धाक जमने लगी। मुंबई के एक कॉलेज में उन्हें प्रोफ़ेसर के पद पर नियुक्त कर लिया गया, किंतु यहाँ भी संघर्ष कम नहीं हुआ। किसी प्रकार भीमराव ने दो वर्ष निकाले। अंत में यहाँ भी उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा। सन् 1920 में उन्होंने छुआछूत की बुराई से लड़ने के लिए ‘मूकनायक’ नामक साप्ताहिक अखबार निकालना आरंभ किया। साधनों के अभाव में कुछ समय बाद उसे भी बंद करना पड़ा। भीमराव पढ़ने के लिए फिर लंदन चले गए। वहाँ तीन वर्ष रहकर उन्होंने अर्थशास्त्र में डी.एससी. की उपाधि प्राप्त की। सन् 1923 में वे मुंबई लौट आए और उन्होंने वकालत आरंभ कर दी। एक वर्ष बाद कुछ मित्रों की सहायता से उन्होंने ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ की स्थापना की। दलितों की समस्याएँ हल करना इस सभा का मुख्य उद्देश्य था। सन् 1927 में उन्होंने ‘बहिष्कृत भारत’ नामक समाचार पत्र भी निकाला। इसी वर्ष वे मुंबई विधान-सभा के सदस्य बनाए गए।
डॉ. अम्बेडकर समाज में दलित को समानता का अधिकार दिलाना चाहते थे। वे उनकी आर्थिक हालत सुधारने के लिए संकल्प ले चुके थे। दलितों का इतिहास बताने के लिए उन्होंने ‘शूद्र कौन थे’ नामक पुस्तक लिखी, जो बहुत लोकप्रिय हुई। भारत के वायसराय ने उनकी योग्यता से प्रभावित होकर उन्हें अपने सचिव-मंडल का सदस्य बनाया। सन् 1947 में भारत के स्वतंत्र होने पर वे संविधान-सभा के सदस्य चुने गए। संविधान का प्रारूप उन्हीं की अध्यक्षता में तैयार हुआ। उन्होंने उसमें दलितों को समानता का अधिकार दिलाया। राष्ट्र की एकता के लिए भी उन्होंने कई बातें संविधान में सम्मिलित करायीं। 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्र भारत की प्रथम सरकार बनी। डॉ. अम्बेडकर भारत सरकार के कानून मंत्री बने। डॉ. अम्बेडकर ने पुराने कानूनों में कई सुधारों की नींव रखी। सन् 1951 में उन्होंने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया।
सरकार से अलग होकर वे पूरी शक्ति से दलितों की सेवा में जुट गए। दलित समाज उन्हें देवता की तरह पूजने लगा। वे जहाँ जाते थे, ‘जय भीम’ के नारों से आकाश गूँज उठता था। रूढ़िवादियों के आगे वे झुकना नहीं जानते थे। उन्होंने दलितों को राय दी, ‘तुम सब बौद्ध बन जाओ!’ उन्होंने सन् 1955 में ‘भारतीय बौद्ध महासभा’ की स्थापना भी कर डाली। एक वर्ष बाद नागपुर में उन्होंने स्वयं भी बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। इस घटना से रूढ़िवादियों में बड़ी खलबली मच गयी। दुर्भाग्य से दलितों का यह नेता अधिक दिनों तक जीवित नहीं रहा। 6 दिसंबर, सन् 1956 को अचानक लाखों पीड़ितों को छोड़कर डॉ. अम्बेडकर स्वर्गवासी हो गए। दलित कहा जाने वाला समाज अब भी डॉ. अम्बेडकर को ‘बाबा साहब’ कहकर सम्मान देता है। वे देश के पिछड़े और दलित समाज के प्राण थे। बचपन से ही उनमें कठिन परिश्रम करने की आदत थी। नित्य 8 घंटे पढ़ना उनके लिए सहज बात थी। सिनेमा और गप-शप से वे दूर रहते थे। कठिनाइयाँ उनका मार्ग नहीं रोक पाती थीं। वे जो सोचते, वही करते थे। उनका भाषण बहुत प्रभावशाली होता था। तर्क करने की उनमें अनोखी शक्ति थी।
डॉ. अम्बेडकर किसी भी धर्म के विरोधी नहीं थे। वे धर्म को मनुष्य के लिए बहुत आवश्यक मानते थे। उनकी लड़ाई तो उन बुराइयों से थी, जिन्हें मनुष्यों ने धर्म में उत्पन्न कर दिया है। बौद्ध धर्म को वे इसलिए पसंद करते थे कि वह समानता पर आधारित है। वे कहा करते थे कि वेद, शास्त्र, स्मृति, पुराण आदि को कुछ लोगों ने छुआछूत का हथियार बना लिया है। डॉ. अम्बेडकर इसलिए महान हैं क्योंकि उन्होंने छुआछूत के पाप को नष्ट करने का प्रयत्न किया। उनके प्रयत्नों से दलितों को कानून में समानता का अधिकार मिला। आज दलित बालक विद्यालयों में सामान्य बालकों के साथ बैठकर पढ़ते हैं, खाते-पीते और खेलते-कूदते हैं। गाड़ियों, होटलों, तीर्थों, मंदिरों आदि सभी जगह उन्हें समानता का अधिकार प्राप्त है। हज़ारों वर्षों के भारतीय इतिहास की यह बहुत बड़ी घटना है। एक बहुत बड़े वर्ग को छुआछूत के पाप से डॉ. अम्बेडकर ने छुटकारा दिलाया। आने वाली पीढ़ियाँ बाबा साहब अम्बेडकर के महान कार्यों को स्मरण कर गौरव का अनुभव करती रहेंगी।
टिप्पणी: वेद — आर्यों के प्राचीनतम धार्मिक ग्रंथ; इनकी संख्या चार है — ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद। शास्त्र — हिंदुओं के वे धार्मिक ग्रंथ, जो लोगों के हित और अनुशासन के लिए बनाए गए। स्मृति — हिंदुओं के धर्मशास्त्र, जिनमें धर्म, दर्शन, आचार-व्यवहार, शासन-नीति आदि का विवेचन है। डी.एससी. — डॉक्टर ऑफ़ साइंस, विज्ञान में सर्वोच्च उपाधि।
तुम्हें क्या सीखना चाहिए
इस जीवनी से डॉ. अम्बेडकर के जीवन का क्रम सीखो — महू में जन्म (14 अप्रैल 1891, चौदहवीं संतान, ‘भीवा’); दपोली और सतारा की पढ़ाई; 1905 में शादी; मुंबई का एलफ़िंस्टन स्कूल; 1907 मैट्रिक; 25 रुपये छात्रवृत्ति; 1913 बी.ए.; बड़ौदा दरबार की नौकरी और घृणा के कारण त्याग; कोलंबिया और लंदन की पढ़ाई; 1920 ‘मूकनायक’; 1923 वकालत; 1924 ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’; 1927 ‘बहिष्कृत भारत’ और विधान-सभा; 1947 संविधान-सभा और प्रारूप-समिति की अध्यक्षता; कानून मंत्री; 1951 त्यागपत्र; 1955 ‘भारतीय बौद्ध महासभा’; 1956 नागपुर में बौद्ध धर्म-स्वीकार; 6 दिसंबर 1956 स्वर्गवास। शब्दार्थ याद रखो (स्मरण–याद, प्रभावशाली–प्रभाववाला, आधारित–आधार में, समानता–बराबरी, बहिष्कृत–बाहर निकाला हुआ, रूढ़िवादी–पुरानी विचारधारा को मानने वाले, स्वर्गवासी–मृत्यु को प्राप्त करना) और वर्ष-मिलान तथा शुद्ध रूप लिखना सीखो।
मुख्य शब्द
- स्मरण — याद
- प्रभावशाली — प्रभाववाला, आकर्षक
- आधारित — आधार में, सहारे में
- समानता — बराबरी
- बहिष्कृत — बाहर निकाला हुआ
- रत्नागिरि — महाराष्ट्र के एक ज़िले का नाम
- रूढ़िवादी — पुरानी विचारधारा को मानने वाले
- स्वर्गवासी — मृत्यु को प्राप्त करना
- छुआछूत — छूने के आधार पर भेदभाव की कुप्रथा
- संविधान-सभा — संविधान बनाने वाली सभा
- प्रारूप — मसौदा, ड्राफ़्ट
- डी.एससी. — डॉक्टर ऑफ़ साइंस, विज्ञान में सर्वोच्च उपाधि
याद रखें
- पाठ: ‘डॉ. भीमराव अम्बेडकर’; जन्म: 14 अप्रैल 1891, महू (मध्यप्रदेश); पिता रामजी सकपाल, सूबेदार मेजर, महार जाति; चौदहवीं संतान; माता भीमाबाई; पालन-पोषण चाची मीराबाई ने किया; प्यार का नाम ‘भीवा’।
- पढ़ाई: दपोली (मराठी स्कूल), सतारा (सरकारी स्कूल), मुंबई (एलफ़िंस्टन स्कूल — वहाँ छुआछूत की कुप्रथा नहीं थी)।
- 1905: रामाबाई से शादी (तब वह नौ वर्ष की थीं); 1907: मैट्रिक; बड़ौदा महाराज सयाजीराव गायकवाड़ की 25 रुपये मासिक छात्रवृत्ति।
- 1913: बी.ए. (किताब के अनुसार); बड़ौदा दरबार की नौकरी — चपरासी तक फ़ाइलें फेंककर देते थे — नौकरी छोड़ दी।
- विदेश: कोलंबिया (अमेरिका) — महार जाति के पहले विद्यार्थी जिन्हें विदेश जाने का अवसर मिला; डॉक्टरेट; 1916: कोलंबिया से लंदन; एक वर्ष बाद मुंबई वापसी।
- बड़ौदा दूसरा प्रवास: सेना में सचिव — कार्यालय में पीने का पानी तक नहीं — आँसू भरकर नौकरी छोड़ दी, मुंबई लौटे।
- 1920: ‘मूकनायक’ साप्ताहिक अखबार (छुआछूत की बुराई से लड़ने के लिए); फिर लंदन — अर्थशास्त्र में डी.एससी.; 1923: मुंबई वापसी, वकालत।
- 1924: ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ की स्थापना; 1927: ‘बहिष्कृत भारत’ समाचार पत्र; 1927: मुंबई विधान-सभा के सदस्य।
- पुस्तक: ‘शूद्र कौन थे’ (बहुत लोकप्रिय); वायसराय के सचिव-मंडल के सदस्य बने।
- 1947: संविधान-सभा के सदस्य; संविधान का प्रारूप उन्हीं की अध्यक्षता में तैयार हुआ; दलितों को समानता का अधिकार; 15 अगस्त 1947: प्रथम सरकार में कानून मंत्री; 1951: त्यागपत्र।
- 1955: ‘भारतीय बौद्ध महासभा’ की स्थापना; 1956: नागपुर में स्वयं बौद्ध धर्म स्वीकार किया।
- 6 दिसंबर 1956: स्वर्गवास; ‘बाबा साहब’ के नाम से सम्मान; नित्य 8 घंटे पढ़ना सहज बात थी।
- विचार: किसी धर्म के विरोधी नहीं; लड़ाई धर्म में मनुष्यों द्वारा उत्पन्न बुराइयों से थी; बौद्ध धर्म समानता पर आधारित होने के कारण पसंद था।
परीक्षा टिप / सामान्य गलती
सामान्य गलती: जन्म-वर्ष या बी.ए.-वर्ष गलत लिखना — किताब के अनुसार जन्म 1891, बी.ए. 1913 याद रखो। दूसरी गलती: दोनों बड़ौदा-नौकरियाँ मिला देना — पहली दरबार की नौकरी (फ़ाइलें फेंककर देना) और दूसरी सेना में सचिव का पद (पीने का पानी तक नहीं) अलग-अलग हैं। तीसरी गलती: ‘मूकनायक’ को मासिक पत्रिका लिखना — वह साप्ताहिक अखबार था। चौथी गलती: संविधान का प्रारूप किसी और की अध्यक्षता में बताना — प्रारूप डॉ. अम्बेडकर की अध्यक्षता में तैयार हुआ। पाँचवीं गलती: बौद्ध धर्म-स्वीकार का वर्ष गलत लिखना — 1956, नागपुर याद रखो।
सारणी / चार्ट: डॉ. अम्बेडकर — जीवन की प्रमुख घटनाएँ
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 14 अप्रैल 1891 | महू में जन्म; चौदहवीं संतान; ‘भीवा’ |
| 1905 | रामाबाई से शादी |
| 1907 | मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण; 25 रुपये मासिक छात्रवृत्ति |
| 1913 | बी.ए.; बड़ौदा दरबार की नौकरी (घृणा के कारण छोड़ी) |
| 1913–1916 | कोलंबिया (अमेरिका) में पढ़ाई; डॉक्टरेट; 1916 लंदन |
| 1916–1917 | बड़ौदा में सेना-सचिव; पानी तक नहीं मिला; नौकरी छोड़ी |
| 1920 | ‘मूकनायक’ साप्ताहिक अखबार |
| 1923 | लंदन से डी.एससी. लेकर मुंबई वापसी; वकालत |
| 1924 | ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ की स्थापना |
| 1927 | ‘बहिष्कृत भारत’ समाचार पत्र; मुंबई विधान-सभा के सदस्य |
| 1947 | संविधान-सभा; प्रारूप उन्हीं की अध्यक्षता में; कानून मंत्री |
| 1951 | मंत्री पद से त्यागपत्र |
| 1955 | ‘भारतीय बौद्ध महासभा’ की स्थापना |
| 1956 | नागपुर में बौद्ध धर्म स्वीकार; 6 दिसंबर 1956 स्वर्गवास |
अभ्यास — खुद करके देखो
- डॉ. अम्बेडकर के जीवन की पाँच सबसे बड़ी घटनाएँ चुनो और बताओ कि प्रत्येक क्यों महत्त्वपूर्ण थी।
संकेत: जन्म, पढ़ाई, नौकरी-त्याग, संविधान, धर्म-स्वीकार — इनमें से सोचो। - बड़ौदा की दोनों नौकरियों में डॉ. अम्बेडकर के साथ कैसा व्यवहार हुआ? दोनों की तुलना करो।
संकेत: पहली में फ़ाइलें फेंककर देना; दूसरी में पीने का पानी तक न मिलना — दोनों सोचो। - डॉ. अम्बेडकर ने बौद्ध धर्म क्यों स्वीकार किया? समानता के विचार से जोड़कर समझाओ।
संकेत: बौद्ध धर्म किस बात पर आधारित है — यह याद करो। - ‘मैं इसे मिटाकर रहूँगा’ — इस निश्चय का क्या अर्थ है? अपने शब्दों में लिखो।
संकेत: बड़ौदा के राजमार्ग पर रोते युवक के विचारों को याद करो। - डॉ. अम्बेडकर को ‘भारतीय संविधान का जनक’ क्यों कहा जाता है? अपने शब्दों में उत्तर दो।
संकेत: संविधान का प्रारूप किसकी अध्यक्षता में तैयार हुआ — यह याद करो।
प्रश्नोत्तर
- डॉ. अम्बेडकर के योगदानों की चर्चा कीजिए।
डॉ. अम्बेडकर ने छुआछूत की बुराई के विरुद्ध जीवन भर संघर्ष किया। उन्होंने ‘मूकनायक’ (1920) और ‘बहिष्कृत भारत’ (1927) जैसे पत्र निकाले, ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ (1924) बनाकर दलितों की समस्याएँ हल कीं, ‘शूद्र कौन थे’ पुस्तक लिखी, संविधान-सभा में संविधान का प्रारूप अपनी अध्यक्षता में तैयार कराया और उसमें दलितों को समानता का अधिकार दिलाया, कानून मंत्री के रूप में पुराने कानूनों में सुधारों की नींव रखी, और अंत में बौद्ध धर्म स्वीकार करके समानता का संदेश दिया। - डॉ. अम्बेडकर ने बौद्ध धर्म क्यों स्वीकार कर लिया?
क्योंकि वे बौद्ध धर्म को समानता पर आधारित मानते थे। वे किसी धर्म के विरोधी नहीं थे, पर उनकी लड़ाई धर्म में मनुष्यों द्वारा उत्पन्न बुराइयों — जैसे छुआछूत — से थी। उन्होंने दलितों को भी राय दी कि ‘तुम सब बौद्ध बन जाओ’, और 1956 में नागपुर में स्वयं भी बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। - डॉ. अम्बेडकर ने बड़ौदा महाराज की नौकरी क्यों छोड़ दी?
दो बार ऐसा हुआ। पहली बार दरबार की नौकरी में कट्टरपंथियों की घृणा का पात्र बनना पड़ा — चपरासी तक फ़ाइलें फेंककर देते थे — इसलिए तंग आकर नौकरी छोड़ दी। दूसरी बार सेना-सचिव के पद पर अधीनस्थ कर्मचारी घृणा करते थे और कार्यालय में पीने का पानी तक नहीं मिलता था — इस व्यवहार से हृदय टूट गया और आँखों में आँसू भरकर नौकरी छोड़ दी। - डॉ. अम्बेडकर के विचारों से आप कहाँ तक सहमत हैं और क्यों?
(अपना उत्तर लिखो — जैसे: मैं सहमत हूँ, क्योंकि छुआछूत मनुष्य की बनायी बुराई है, भगवान की नहीं; सबको समान रूप से जन्म मिलता है, इसलिए सबको समान अधिकार मिलने चाहिए।) - डॉ. अम्बेडकर की मृत्यु कब हुई और उन्हें किस नाम से सम्मान दिया जाता है?
6 दिसंबर, सन् 1956 को डॉ. अम्बेडकर स्वर्गवासी हो गए। दलित कहा जाने वाला समाज अब भी उन्हें ‘बाबा साहब’ कहकर सम्मान देता है।
किताब के अभ्यास — विस्तार सहित प्रश्नोत्तर
किताब के ‘प्रश्न-अभ्यास’ खंड से, EG के अपने शब्दों में उत्तर। व्यक्तिगत प्रश्नों के उत्तर अपने अनुभव से लिखने हैं।
- पाठ से 1 — डॉ. अम्बेडकर के योगदानों की चर्चा कीजिए।
छुआछूत-विरोधी संघर्ष; ‘मूकनायक’ और ‘बहिष्कृत भारत’ पत्र; ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’; ‘शूद्र कौन थे’ पुस्तक; संविधान का प्रारूप (अध्यक्षता) और उसमें समानता का अधिकार; कानून मंत्री के रूप में सुधार; बौद्ध धर्म का समानता-संदेश। - पाठ से 2 — डॉ. अम्बेडकर ने बौद्ध धर्म क्यों स्वीकार कर लिया?
क्योंकि बौद्ध धर्म समानता पर आधारित है; उनकी लड़ाई धर्म की बुराइयों से थी, धर्म से नहीं। - पाठ से 3 — डॉ. अम्बेडकर ने बड़ौदा महाराज की नौकरी क्यों छोड़ दी?
घृणा और अपमान के कारण — पहली बार फ़ाइलें फेंककर दी जाती थीं; दूसरी बार पीने का पानी तक नहीं मिलता था। - पाठ से 4 — डॉ. अम्बेडकर के विचारों से आप कहाँ तक सहमत हैं और क्यों?
(अपना उत्तर लिखो — जैसे: पूरी तरह सहमत हूँ, क्योंकि समानता मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है।) - पाठ से 5 — स्तंभ ‘क’ और स्तंभ ‘ख’ का सही मिलान कीजिए।
डॉ. अम्बेडकर का जन्म — 1891; डॉ. अम्बेडकर ने हाई स्कूल (मैट्रिक) की परीक्षा पास की — 1907; डॉ. अम्बेडकर ने बी.ए. की परीक्षा पास की — 1913; डॉ. अम्बेडकर की शादी — 1905; ‘मूकनायक’ नामक साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन — 1920; डॉ. अम्बेडकर की मृत्यु — 1956। - पाठ से आगे 1 — डॉ. अम्बेडकर को ‘भारतीय संविधान का जनक’ क्यों कहा जाता है?
क्योंकि संविधान का प्रारूप उन्हीं की अध्यक्षता में तैयार हुआ और उन्होंने उसमें दलितों को समानता का अधिकार दिलाया तथा राष्ट्र की एकता के लिए कई बातें सम्मिलित करायीं। - पाठ से आगे 2 — डॉ. अम्बेडकर को ‘बाबा साहब’ उपनाम से जानते हैं। कुछ और भी महापुरुषों के उपनाम हैं। उनके नाम और उपनाम लिखिए।
(अपना उत्तर लिखो — जैसे: महात्मा गाँधी — ‘महात्मा’/‘बापू’; सुभाष चंद्र बोस — ‘नेताजी’; जवाहरलाल नेहरू — ‘चाचा नेहरू’; सरदार पटेल — ‘लौह पुरुष’। किताब/शिक्षक से मिलान करो।) - पाठ से आगे 3 — ‘बाबा साहब’ किस प्रकार के भारत को देखना चाहते थे?
(अपना उत्तर लिखो — जैसे: ऐसा भारत जहाँ छुआछूत न हो, सबको समानता का अधिकार मिले, सब साथ बैठकर पढ़ें, खाएँ-पीएँ, खेलें — एकता वाला भारत।) - व्याकरण 1 — इन शब्दों के शुद्ध रूप लिखिए।
महतवपूर्ण — महत्त्वपूर्ण; परीस्थीती — परिस्थिति; निसचय — निश्चय; आत्मविसवास — आत्मविश्वास; रत्नागीरी — रत्नागिरि; अधयापक — अध्यापक। - व्याकरण 2 — पाठ में प्रयुक्त विराम-चिह्नों का उदाहरण सहित प्रयोग लिखिए।
उद्धरण चिह्न (“ ”): ‘मैं अछूत हूँ, यह पाप है।’ — इस वाक्य को उद्धरण चिह्नों में लिखा गया है। विस्मयादिसूचक चिह्न (!): ‘तुम सब बौद्ध बन जाओ!’ प्रश्नसूचक चिह्न (?): ‘किसने बनायी है छुआछूत की व्यवस्था?’ योजक चिह्न (-): पालन-पोषण, संविधान-सभा, छुआछूत-विरोधी। अल्प विराम (,): ‘संध्या हो रही है, पश्चिम दिशा में लाली फैल रही है।’ पूर्ण विराम (।): हर वाक्य के अंत में — जैसे ‘वे जो सोचते, वही करते थे।’ - कुछ करने को 1 — वर्ग-पहेली में छिपे पाँच महापुरुषों के नाम ढूँढकर लिखिए।
(गतिविधि: किताब की वर्ग-पहेली में मोटे अक्षर से शुरू होने वाले पाँच महापुरुषों के नाम ढूँढकर लिखो। नोट: पहेली का ग्रिड स्कैन में अस्पष्ट है, इसलिए नाम यहाँ अनुमान से नहीं लिखे गए हैं — किताब से देखकर लिखो।) - कुछ करने को 2 — कक्षा में विभिन्न परिवेश के बच्चे पढ़ते हैं। सहपाठियों के घर जाकर देखिए, अभिभावकों से बातचीत कीजिए और मित्रों से उस पर चर्चा कीजिए।
(गतिविधि: सहपाठियों के घर जाकर उनके रहन-सहन को देखो, उनके अभिभावकों से बातचीत करो और कक्षा में मित्रों से इस पर चर्चा करो।) - कुछ करने को 3 — भारत के संविधान की प्रस्तावना साफ़-साफ़ एवं सुंदर अक्षर में लिखिए और कक्षा में सुनाइए।
(गतिविधि: संविधान की प्रस्तावना सुंदर अक्षरों में लिखो और कक्षा में सुनाओ।) - कुछ करने को 4 — पाठ में आए डॉ. अम्बेडकर के कार्यों की सूची बनाकर अपने वर्ग-कक्ष में टाँगिए।
(गतिविधि: ‘मूकनायक’, ‘बहिष्कृत भारत’, ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’, ‘शूद्र कौन थे’, संविधान-प्रारूप, कानून-मंत्री के सुधार, ‘भारतीय बौद्ध महासभा’ — इन कार्यों की सूची बनाकर वर्ग-कक्ष में टाँगो।)
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महत्वपूर्ण प्रश्न — प्रश्न और उत्तर (Important Questions)
नीचे दिए गए प्रश्न ‘डॉ. भीमराव अम्बेदकर’ की समझ की जाँच के लिए हैं — उत्तर पहले बिना देखे लिखें, फिर पृष्ठ से मिलाकर सुधारें।
- ‘डॉ. भीमराव अम्बेदकर’ का केंद्रीय भाव अपने शब्दों में लिखिए।
‘डॉ. भीमराव अम्बेदकर’ का केंद्रीय भाव यह है कि पाठ का मुख्य संदेश उसके शीर्षक और उसके प्रसंगों के आपसी संबंध से बनता है। सार खंड में दिए गए बिंदुओं को क्रम से जोड़कर, बिना मूल पंक्तियों की नकल किए, पाँच-सात वाक्यों में लिखें — पहले विषय का परिचय, फिर दो-तीन मुख्य तर्क या प्रसंग, और अंत में पाठ की सीख। जो उत्तर इस क्रम में लिखा जाता है, वह पूरा और संतुलित लगता है। - ‘स्मरण’ का अर्थ प्रसंग सहित समझाइए।
‘स्मरण’ का अर्थ केवल शब्दकोश से नहीं, बल्कि ‘डॉ. भीमराव अम्बेदकर’ के प्रसंग से समझना चाहिए। पहले इसका सामान्य अर्थ लिखें, फिर यह बताएँ कि पाठ में यह किस प्रसंग में आया है और उस प्रसंग में इसका क्या महत्त्व है। परिभाषा, प्रसंग और महत्त्व — ये तीन कड़ियाँ मिलकर ही पूरा उत्तर बनाती हैं। - ‘डॉ. भीमराव अम्बेदकर’ से क्या सीख मिलती है? अपने जीवन से जोड़कर बताइए।
इस पाठ की सीख केवल परीक्षा के लिए नहीं, बल्कि दृष्टिकोण के लिए है — पाठ जो मूल्य या सिद्धांत प्रस्तुत करता है, उसे दैनिक जीवन के एक उदाहरण से जोड़कर देखें। उत्तर में पहले पाठ की सीख एक वाक्य में लिखें, फिर अपने जीवन का एक छोटा उदाहरण दें, और अंत में यह बताएँ कि उस सीख को अपनाने से क्या अंतर पड़ेगा। सीख और उदाहरण का यह जोड़ ही अच्छे उत्तर की पहचान है। - ‘डॉ. भीमराव अम्बेदकर’ के अध्ययन में विद्यार्थी सबसे बड़ी गलती क्या करते हैं?
सबसे बड़ी गलती है — केवल सार रट लेना, बिना प्रसंग और शब्दार्थ समझे। ऐसा विद्यार्थी प्रश्न के शब्द बदल जाने पर उत्तर नहीं बना पाता। इससे बचने के लिए प्रत्येक शब्द को प्रसंग सहित पढ़ें, प्रत्येक अनुच्छेद के बाद ‘इसने केंद्रीय भाव में क्या जोड़ा’ पूछें, और अंत में बिना देखे सार लिखकर जाँचें। समझ के साथ पढ़ा गया पाठ ही परीक्षा में काम आता है। - ‘डॉ. भीमराव अम्बेदकर’ पर पाँच अंक का प्रश्न आए, तो उत्तर की रूपरेखा कैसी हो?
रूपरेखा इस प्रकार हो — भूमिका में एक वाक्य का परिचय, मुख्य भाग में तीन-चार बिंदु क्रम से, प्रत्येक बिंदु के साथ एक छोटा उदाहरण या परिणाम, और निष्कर्ष में एक वाक्य का संदेश। बिंदुओं को अलग-अलग पंक्तियों या अनुच्छेदों में लिखें, मुख्य शब्दों का सही प्रयोग करें, और मूल पाठ की नकल से बचें। यही रूपरेखा लंबे उत्तर को पूर्ण और पठनीय बनाती है। - ‘प्रभावशाली’ जैसे मुख्य शब्दों को लंबे समय तक याद रखने की विधि क्या है?
मुख्य शब्दों को तीन के समूह में बाँटकर पढ़ें — शब्द, अर्थ और प्रसंग। प्रत्येक समूह को एक वाक्य में बाँधकर बोलकर दोहराएँ, फिर बिना देखे लिखें। अगले दिन फिर से बिना देखे लिखकर जाँचें। जो शब्द छूट जाए, उसे फिर से प्रसंग सहित पढ़ें। बोलना, लिखना और अगले दिन दोहराना — यही तीन चरण किसी भी शब्द को स्थायी बनाते हैं। - ‘डॉ. भीमराव अम्बेदकर’ को पढ़ने के बाद स्वयं से कौन-से तीन प्रश्न पूछने चाहिए?
पहला — इस पाठ का केंद्रीय भाव एक वाक्य में क्या है? दूसरा — मुख्य शब्दों का प्रसंग सहित अर्थ क्या है? तीसरा — इस पाठ की सीख मेरे जीवन में कहाँ काम आएगी? यदि इन तीनों प्रश्नों के उत्तर बिना पुस्तक देखे दिए जा सकें, तो पाठ तैयार है। यदि कोई उत्तर अटके, तो उसी अंश को दोबारा पढ़ें। - ‘डॉ. भीमराव अम्बेदकर’ के उत्तर में मूल पाठ की नकल क्यों नहीं करनी चाहिए?
क्योंकि परीक्षक समझ की जाँच करता है, याददाश्त की नकल की नहीं। मूल पंक्तियों की नकल से यह पता नहीं चलता कि विद्यार्थी ने भाव समझा है या नहीं। अपने शब्दों में लिखा गया उत्तर, भले ही सरल हो, यह सिद्ध करता है कि भाव समझ में आ गया है। इसीलिए सार और उत्तर हमेशा अपनी भाषा में लिखें, मुख्य शब्दों को छोड़कर।

