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Chapter 12: रहीम के दोहे

Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 6 • Hindi • Book: Kislay Bhag-1 (Purani pustak — 2025 se pehle wali)

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रहीम के दोहे — EG के अपने नोट्स, सरल शब्दों में

पुस्तक: Kislay Bhag-1 (Purani pustak — 2025 se pehle wali) (BSEB, Class 6)  |  अध्याय 12  |  प्रकार: कविता  |  माध्यम: हिंदी

यह पृष्ठ Educational Galaxy के अपने मूल नोट्स हैं — पाठ का विषय-स्तरीय (theme-level) सार, किताब की नकल नहीं। यहाँ कोई आधिकारिक BSTBPC PDF नहीं दिया जाता है।

रहीम के दोहे के लिए लेबल वाला चित्र

चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): लिखते हुए एक कवि। यह एक सामान्य चित्र है, किताब का दृश्य नहीं।

रहीम के दोहे के लिए चित्र

छोटों को छाया देता एक बड़ा पेड़ — परोपकार का एक सामान्य चित्र।

अध्याय का सार

इस पाठ में कवि रहीम के आठ दोहे हैं। दोहा दो पंक्तियों का छोटा छंद है, जिसमें जीवन का बड़ा सत्य सीधे-सादे उदाहरण से समझाया गया है। हर दोहे का भाव नीचे दिया गया है — दोहे को पढ़ो, फिर उसका अर्थ अपने शब्दों में बोलकर देखो।

दोहा 1 — उत्तम प्रकृति: ‘जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग। चंदन विष व्यापत नहिं, लपटे रहत भुजंग।’ — चंदन के वृक्ष पर साँप लिपटे रहते हैं, फिर भी चंदन में विष नहीं व्यापता। वैसे ही, जिसका स्वभाव उत्तम है, उस पर बुरी संगति का बुरा प्रभाव नहीं पड़ता।

दोहा 2 — मन की व्यथा: ‘रहीमन निज मन की व्यथा, मन ही राखौ गोय। सुनि अठिलैहें लोग सब, बाँटि न लैहें कोय।’ — अपनी मन की पीड़ा मन में ही छिपाकर रखो; सुनकर सब लोग हँसेंगे (उपहास करेंगे), पर उसे बाँटकर कोई नहीं लेगा — अर्थात् तुम्हारा दुःख कोई कम नहीं करेगा।

दोहा 3 — प्रेम का धागा: ‘रहीमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय। टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परि जाय।’ — प्रेम के धागे को झटके से मत तोड़ो; टूटा हुआ धागा फिर जुड़ता नहीं, और जुड़ भी जाए तो गाँठ पड़ जाती है — अर्थात् प्रेम में एक बार दरार पड़ जाए, तो पहले जैसा मेल नहीं रहता।

दोहा 4 — परोपकार: ‘तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहिं न पानि। कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहिं सुजान।’ — वृक्ष अपना फल स्वयं नहीं खाता, तालाब अपना पानी स्वयं नहीं पीता। रहीम कहते हैं कि सज्जन (सुजान) लोग परोपकार के लिए ही संपत्ति इकट्ठा करते हैं।

दोहा 5 — छोटे का सम्मान: ‘रहीम देखि बड़ेन को, लघु न दीजै डारि। जहाँ काम आवे सुई, कहा करै तरवारि।’ — बड़ों को देखकर छोटों को मत त्यागो; जहाँ सुई काम आती है, वहाँ तलवार क्या करेगी — अर्थात् हर छोटे-बड़े का अपना काम और अपना महत्त्व है।

दोहा 6 — माँगना: ‘रहीमन वे नर मर चुके, जे कहूँ माँगन जाहिं। उनते पहिले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहिं।’ — जो कहीं माँगने जाते हैं, वे (अपने सम्मान के अर्थ में) मर चुके हैं; और उनसे पहले वे मरे हुए हैं, जिनके मुँह से (माँगने पर देने के लिए) कुछ निकलता ही नहीं — अर्थात् कंजूस, जो किसी की सहायता नहीं करता, वह तो पहले से ही मरा हुआ है।

दोहा 7 — उपकारी का संग: ‘ज्यों रहीम सुख होत है, उपकारी के संग। बाँटनवारे को लगे, ज्यों मेंहदी का रंग।’ — उपकारी (परोपकारी) के संग रहने से सुख मिलता है, जैसे मेंहदी बाँटने वाले के हाथों में भी मेंहदी का रंग लग जाता है — भला करने वाले के साथ रहने वाले का भी भला हो जाता है।

दोहा 8 — धैर्य: ‘कारज धीरे होत है, काहे होत अधीर। समय पाइ तरुवर फलैं, केतक सींचो नीर।’ — काम धीरे-धीरे होता है, अधीर क्यों होते हो? समय पाकर वृक्ष फलता है, चाहे कितना ही पानी सींचो — अर्थात् हर काम का अपना समय होता है, जल्दबाज़ी से काम नहीं बनता।

तुम्हें क्या सीखना चाहिए

इस पाठ से आठ दोहों के भाव सीखो — उत्तम प्रकृति पर कुसंग का प्रभाव नहीं; मन की व्यथा छिपाकर रखना; प्रेम का धागा न तोड़ना; सज्जनों की संपत्ति परोपकार के लिए; बड़ों के साथ छोटों का सम्मान (सुई-तरवारि); माँगने का कर्म और कंजूसी; उपकारी के संग का सुख (मेंहदी का रंग); और धैर्य (कारज धीरे होत है)। शब्दार्थ याद रखो (निज–अपना, गोय–गुप्त, अठिलैहें–उपहास करना, तरुवर–वृक्ष, सरवर–तालाब, सँचहिं–इकट्ठा करना, परकाज–परोपकार, कुसंग–बुरे लोगों का साथ, भुजंग–साँप, लघु–छोटा, तरवारि–तलवार, मुए–मृत) और समानार्थी शब्दों का मिलान सीखो।

मुख्य शब्द

  • निज — अपना
  • गोय — गुप्त, छिपाकर
  • अठिलैहें — उपहास करेंगे, हँसेंगे
  • तरुवर — वृक्ष
  • सरवर — तालाब
  • सँचहिं — इकट्ठा करना
  • परकाज — परोपकार, दूसरों का काम
  • उत्तम प्रकृति — बहुत अच्छा स्वभाव
  • कुसंग — खराब लोगों का साथ
  • भुजंग — साँप
  • लघु — छोटा
  • बड़ेन — उच्च, महान
  • तरवारि — तलवार
  • मुए — मृत, मरे हुए
  • दोहा — दो पंक्तियों का छंद

याद रखें

  • पाठ: ‘रहीम के दोहे’; कवि: रहीम; कुल आठ दोहे।
  • दोहा 1: उत्तम प्रकृति पर कुसंग का प्रभाव नहीं — चंदन पर साँप लिपटे रहते हैं, विष नहीं व्यापता।
  • दोहा 2: निज मन की व्यथा मन ही राखौ गोय — सुनकर लोग हँसेंगे, बाँटकर कोई नहीं लेगा।
  • दोहा 3: प्रेम का धागा झटके से मत तोड़ो — टूटकर फिर नहीं जुड़ता, जुड़ता है तो गाँठ पड़ जाती है।
  • दोहा 4: तरुवर फल नहीं खाता, सरवर पानी नहीं पीता — सज्जन परोपकार के लिए संपत्ति सँचते हैं।
  • दोहा 5: बड़ों को देखकर छोटों को मत त्यागो — जहाँ सुई काम आवे, वहाँ तरवारि क्या करे।
  • दोहा 6: माँगने वाले मर चुके हैं; उनसे पहले वे मरे, जिनके मुँह से (देने के लिए) कुछ निकलता नहीं।
  • दोहा 7: उपकारी के संग सुख — जैसे मेंहदी बाँटने वाले को मेंहदी का रंग लग जाता है।
  • दोहा 8: कारज धीरे होत है — समय पाकर वृक्ष फलता है, चाहे कितना ही पानी सींचो।
  • व्याकरण: समानार्थी मिलान — राखौ–रखना, अठिलाना–इतराना, सरवर–तालाब, निकसत–निकलना, कारज–काम।

परीक्षा टिप / सामान्य गलती

सामान्य गलती: दोहे का भाव लिखते समय केवल शब्दार्थ लिख देना — भाव के साथ उदाहरण भी लिखो (चंदन-भुजंग, सुई-तरवारि, मेंहदी का रंग)। दूसरी गलती: दोहा 6 में केवल माँगने वाले को ‘मरा’ बताना — दूसरी पंक्ति भी लिखो: उससे पहले वह मरा है, जिसके मुँह से (देने के लिए) कुछ निकलता नहीं। तीसरी गलती: दोहा 3 में ‘गाँठ’ छोड़ देना — टूटा धागा जुड़ भी जाए, तो गाँठ पड़ जाती है, पहले जैसा मेल नहीं रहता। चौथी गलती: पाठ से 5 की उप-संख्या में ङ खोजना — किताब में क्रम क, ख, ग, घ, छ है।

सारणी / चार्ट: आठ दोहे — एक दृष्टि में

दोहापहचानभाव
1चंदन–भुजंगउत्तम प्रकृति पर कुसंग का प्रभाव नहीं पड़ता
2मन की व्यथाअपनी पीड़ा छिपाकर रखो; लोग हँसेंगे, बाँटकर कोई नहीं लेगा
3प्रेम का धागाटूटा प्रेम फिर नहीं जुड़ता; जुड़े तो गाँठ पड़ जाती है
4तरुवर–सरवरसज्जन परोपकार के लिए संपत्ति सँचते हैं
5सुई–तरवारिछोटों का भी अपना महत्त्व है; बड़ों को देखकर उन्हें मत त्यागो
6माँगनमाँगना सम्मान की मृत्यु है; कंजूसी उससे भी पहले की मृत्यु है
7मेंहदी का रंगउपकारी के संग रहने वाले का भी भला हो जाता है
8कारज धीरेहर काम का अपना समय होता है; अधीर मत होओ

अभ्यास — खुद करके देखो

  1. चंदन और भुजंग के उदाहरण से समझाओ कि उत्तम प्रकृति पर कुसंग का प्रभाव क्यों नहीं पड़ता।
    संकेत: चंदन में विष क्यों नहीं व्यापता — इस बात को सोचो।
  2. प्रेम को धागा क्यों कहा गया है? टूटे धागे की गाँठ का क्या अर्थ है? अपने शब्दों में लिखो।
    संकेत: दोस्ती में एक बार दरार पड़ने के बाद क्या होता है — अपने अनुभव से जोड़ो।
  3. तरुवर और सरवर के उदाहरण से परोपकार समझाओ।
    संकेत: वृक्ष और तालाब अपना फल-पानी किसके लिए रखते हैं?
  4. ‘जहाँ काम आवे सुई, कहा करै तरवारि’ — इस भाव को अपने जीवन के किसी उदाहरण से समझाओ।
    संकेत: कोई छोटी चीज़ जो बड़े काम आई हो — उसे सोचो।
  5. माँगने वाले और न देने वाले में से रहीम ने किसे पहले ‘मरा’ कहा है और क्यों?
    संकेत: दोहे की दूसरी पंक्ति — ‘जिन मुख निकसत नाहिं’ — को ध्यान से पढ़ो।

प्रश्नोत्तर

  1. अपने मन की पीड़ा को क्यों छिपाकर रखनी चाहिए?
    क्योंकि रहीम कहते हैं — सुनकर सब लोग हँसेंगे (उपहास करेंगे), पर तुम्हारी पीड़ा को बाँटकर कोई नहीं लेगा। अर्थात् अपनी व्यथा सबको सुनाने से दुःख कम नहीं होता, उल्टा लोग हँसी उड़ाते हैं; इसलिए मन की व्यथा मन में ही रखनी चाहिए।
  2. प्रेम को धागे के समान क्यों कहा गया है?
    क्योंकि प्रेम धागे जैसा नाज़ुक होता है — उसे झटके से मत तोड़ो। टूटा हुआ धागा फिर जुड़ता नहीं, और अगर जुड़ भी जाए, तो गाँठ पड़ जाती है — पहले जैसा मेल और विश्वास नहीं रहता। इसलिए प्रेम को टूटने से बचाना चाहिए।
  3. किसी से कुछ माँगने के कर्म को कैसा बताया गया है और क्यों?
    माँगने के कर्म को सम्मान की मृत्यु जैसा बताया गया है — जो कहीं माँगने जाता है, वह (अपने सम्मान के अर्थ में) मर चुका है। और उससे पहले वह मरा हुआ है, जिसके मुँह से माँगने पर देने के लिए कुछ निकलता ही नहीं — अर्थात् कंजूस व्यक्ति तो पहले से ही मरा हुआ है।
  4. सज्जनों की संपत्ति किस कार्य के लिए होती है?
    सज्जनों की संपत्ति परोपकार (परकाज) के लिए होती है। जैसे वृक्ष अपना फल स्वयं नहीं खाता और तालाब अपना पानी स्वयं नहीं पीता, वैसे ही सज्जन लोग दूसरों के भले के लिए संपत्ति इकट्ठा करते हैं।
  5. उपकारी के संग का सुख और धैर्य — दोनों दोहों का भाव लिखो।
    उपकारी के संग रहने से सुख मिलता है, जैसे मेंहदी बाँटने वाले के हाथों में भी मेंहदी का रंग लग जाता है — भला करने वाले के साथ रहने वाले का भी भला हो जाता है। और धैर्य का संदेश यह है कि काम धीरे-धीरे होता है, अधीर मत होओ — समय पाकर वृक्ष फलता है, चाहे कितना ही पानी सींचो।

किताब के अभ्यास — विस्तार सहित प्रश्नोत्तर

किताब के ‘प्रश्न-अभ्यास’ खंड से, EG के अपने शब्दों में उत्तर। व्यक्तिगत प्रश्नों के उत्तर अपने अनुभव से लिखने हैं।

  1. पाठ से 1 — अपने मन की पीड़ा को क्यों छिपाकर रखनी चाहिए?
    क्योंकि सुनकर लोग हँसेंगे, बाँटकर कोई नहीं लेगा — पीड़ा सुनाने से दुःख कम नहीं होता।
  2. पाठ से 2 — प्रेम को धागे के समान क्यों कहा गया?
    क्योंकि प्रेम धागे जैसा नाज़ुक है — टूटने पर फिर नहीं जुड़ता, जुड़े तो गाँठ पड़ जाती है।
  3. पाठ से 3 — किसी से कुछ माँगने के कर्म को कैसा बताया गया है और क्यों?
    सम्मान की मृत्यु जैसा — माँगने वाला मर चुका है; और उससे पहले वह मरा है, जिसके मुँह से देने के लिए कुछ निकलता नहीं (कंजूस)।
  4. पाठ से 4 — सज्जनों की संपत्ति किस कार्य के लिए होती है?
    परोपकार (परकाज) के लिए — जैसे तरुवर का फल और सरवर का पानी दूसरों के लिए होता है।
  5. पाठ से 5 — रहीम की सूक्तियों के प्रमाण-स्वरूप पाठ से उदाहरण लिखिए।
    (क) अच्छे लोगों पर बुरे लोगों की संगति का बुरा प्रभाव नहीं पड़ता — चंदन पर साँप लिपटे रहते हैं, फिर भी चंदन में विष नहीं व्यापता। (ख) भले लोग परोपकार के कार्य पर खर्च करते हैं — तरुवर फल नहीं खाता, सरवर पानी नहीं पीता; सज्जन परकाज हित संपत्ति सँचते हैं। (ग) हमें बड़े-छोटे सभी का सम्मान करना चाहिए — जहाँ काम आवे सुई, कहा करै तरवारि। (घ) दूसरों का भला करने वालों का अपने आप भला हो जाता है — उपकारी के संग सुख होता है, जैसे मेंहदी बाँटने वाले को मेंहदी का रंग लग जाता है। (छ) हमें किसी कार्य के लिए अत्यधिक व्याकुल नहीं होना चाहिए — कारज धीरे होत है; समय पाकर वृक्ष फलता है, चाहे कितना ही पानी सींचो।
  6. पाठ से 6 — ‘जहाँ काम आवे सुई, कहा करै तरवारि’ का भाव स्पष्ट करें।
    भाव यह है कि हर चीज़ का अपना काम और अपना महत्त्व है — छोटी चीज़ को बेकार मत समझो। जहाँ सुई का काम है (सीना, बारीक काम), वहाँ तलवार बेकार है। इसलिए बड़ों को देखकर छोटों को मत त्यागो; हर छोटे-बड़े का सम्मान करो।
  7. पाठ से आगे 1 — ऐसे किन्हीं दो अवसरों की चर्चा कीजिए जब आपने दूसरों के लिए काम किया और आपको उसका लाभ मिला हो।
    (अपना उत्तर लिखो — जैसे: किसी सहपाठी की पढ़ाई में मदद की, तो मेरी भी तैयारी पक्की हो गई; या किसी की सेवा की, तो सबका स्नेह मिला।)
  8. पाठ से आगे 2 — परोपकार से आप क्या समझते हैं? ऐसे कार्यों की सूची बनाइए जिन्हें आप परोपकार का कार्य समझते हैं।
    परोपकार = दूसरों का भला करना, बिना स्वार्थ के सहायता करना। सूची — जैसे: भूखे को भोजन देना, बीमार की सेवा करना, किसी को पढ़ाना, प्यासे को पानी पिलाना, वृक्ष लगाना, गरीब की सहायता करना। (अपनी सूची बनाओ।)
  9. व्याकरण 1 — समान अर्थ वाले शब्दों को मिलाइए।
    राखौ — रखना; अठिलाना — इतराना (उपहास करना); सरवर — तालाब; निकसत — निकलना; कारज — काम।
  10. कुछ करने को 1 — दस परोपकारी व्यक्तियों की सूची बनाइए और उनके परोपकार के कार्यों को भी लिखिए।
    (गतिविधि: दस परोपकारी व्यक्तियों — जैसे: अपने गाँव/मोहल्ले के सेवाभावी लोग, शिक्षक, डॉक्टर, समाजसेवी — की सूची बनाओ और प्रत्येक के एक परोपकार-कार्य को लिखो।)

इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: सार पढ़ें, मुख्य शब्द अपने शब्दों में बोलें, फिर बिना देखे अभ्यास करके देखें। प्रश्नोत्तर से अपने आप को जाँचें। अपने उत्तर शिक्षक या माता-पिता से जाँचवाएँ।

महत्वपूर्ण प्रश्न — प्रश्न और उत्तर (Important Questions)

नीचे दिए गए प्रश्न ‘रहीम के दोहे’ की समझ की जाँच के लिए हैं — उत्तर पहले बिना देखे लिखें, फिर पृष्ठ से मिलाकर सुधारें।

  1. ‘रहीम के दोहे’ का केंद्रीय भाव अपने शब्दों में लिखिए।
    ‘रहीम के दोहे’ का केंद्रीय भाव यह है कि पाठ का मुख्य संदेश उसके शीर्षक और उसके प्रसंगों के आपसी संबंध से बनता है। सार खंड में दिए गए बिंदुओं को क्रम से जोड़कर, बिना मूल पंक्तियों की नकल किए, पाँच-सात वाक्यों में लिखें — पहले विषय का परिचय, फिर दो-तीन मुख्य तर्क या प्रसंग, और अंत में पाठ की सीख। जो उत्तर इस क्रम में लिखा जाता है, वह पूरा और संतुलित लगता है।
  2. ‘निज’ का अर्थ प्रसंग सहित समझाइए।
    ‘निज’ का अर्थ केवल शब्दकोश से नहीं, बल्कि ‘रहीम के दोहे’ के प्रसंग से समझना चाहिए। पहले इसका सामान्य अर्थ लिखें, फिर यह बताएँ कि पाठ में यह किस प्रसंग में आया है और उस प्रसंग में इसका क्या महत्त्व है। परिभाषा, प्रसंग और महत्त्व — ये तीन कड़ियाँ मिलकर ही पूरा उत्तर बनाती हैं।
  3. ‘रहीम के दोहे’ से क्या सीख मिलती है? अपने जीवन से जोड़कर बताइए।
    इस पाठ की सीख केवल परीक्षा के लिए नहीं, बल्कि दृष्टिकोण के लिए है — पाठ जो मूल्य या सिद्धांत प्रस्तुत करता है, उसे दैनिक जीवन के एक उदाहरण से जोड़कर देखें। उत्तर में पहले पाठ की सीख एक वाक्य में लिखें, फिर अपने जीवन का एक छोटा उदाहरण दें, और अंत में यह बताएँ कि उस सीख को अपनाने से क्या अंतर पड़ेगा। सीख और उदाहरण का यह जोड़ ही अच्छे उत्तर की पहचान है।
  4. ‘रहीम के दोहे’ के अध्ययन में विद्यार्थी सबसे बड़ी गलती क्या करते हैं?
    सबसे बड़ी गलती है — केवल सार रट लेना, बिना प्रसंग और शब्दार्थ समझे। ऐसा विद्यार्थी प्रश्न के शब्द बदल जाने पर उत्तर नहीं बना पाता। इससे बचने के लिए प्रत्येक शब्द को प्रसंग सहित पढ़ें, प्रत्येक अनुच्छेद के बाद ‘इसने केंद्रीय भाव में क्या जोड़ा’ पूछें, और अंत में बिना देखे सार लिखकर जाँचें। समझ के साथ पढ़ा गया पाठ ही परीक्षा में काम आता है।
  5. ‘रहीम के दोहे’ पर पाँच अंक का प्रश्न आए, तो उत्तर की रूपरेखा कैसी हो?
    रूपरेखा इस प्रकार हो — भूमिका में एक वाक्य का परिचय, मुख्य भाग में तीन-चार बिंदु क्रम से, प्रत्येक बिंदु के साथ एक छोटा उदाहरण या परिणाम, और निष्कर्ष में एक वाक्य का संदेश। बिंदुओं को अलग-अलग पंक्तियों या अनुच्छेदों में लिखें, मुख्य शब्दों का सही प्रयोग करें, और मूल पाठ की नकल से बचें। यही रूपरेखा लंबे उत्तर को पूर्ण और पठनीय बनाती है।
  6. ‘गोय’ जैसे मुख्य शब्दों को लंबे समय तक याद रखने की विधि क्या है?
    मुख्य शब्दों को तीन के समूह में बाँटकर पढ़ें — शब्द, अर्थ और प्रसंग। प्रत्येक समूह को एक वाक्य में बाँधकर बोलकर दोहराएँ, फिर बिना देखे लिखें। अगले दिन फिर से बिना देखे लिखकर जाँचें। जो शब्द छूट जाए, उसे फिर से प्रसंग सहित पढ़ें। बोलना, लिखना और अगले दिन दोहराना — यही तीन चरण किसी भी शब्द को स्थायी बनाते हैं।
  7. ‘रहीम के दोहे’ को पढ़ने के बाद स्वयं से कौन-से तीन प्रश्न पूछने चाहिए?
    पहला — इस पाठ का केंद्रीय भाव एक वाक्य में क्या है? दूसरा — मुख्य शब्दों का प्रसंग सहित अर्थ क्या है? तीसरा — इस पाठ की सीख मेरे जीवन में कहाँ काम आएगी? यदि इन तीनों प्रश्नों के उत्तर बिना पुस्तक देखे दिए जा सकें, तो पाठ तैयार है। यदि कोई उत्तर अटके, तो उसी अंश को दोबारा पढ़ें।
  8. ‘रहीम के दोहे’ के उत्तर में मूल पाठ की नकल क्यों नहीं करनी चाहिए?
    क्योंकि परीक्षक समझ की जाँच करता है, याददाश्त की नकल की नहीं। मूल पंक्तियों की नकल से यह पता नहीं चलता कि विद्यार्थी ने भाव समझा है या नहीं। अपने शब्दों में लिखा गया उत्तर, भले ही सरल हो, यह सिद्ध करता है कि भाव समझ में आ गया है। इसीलिए सार और उत्तर हमेशा अपनी भाषा में लिखें, मुख्य शब्दों को छोड़कर।