Chapter 10: भीष्म की प्रतिज्ञा
Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 6 • Hindi • Book: Kislay Bhag-1 (Purani pustak — 2025 se pehle wali)
भीष्म की प्रतिज्ञा — EG के अपने नोट्स, सरल शब्दों में
पुस्तक: Kislay Bhag-1 (Purani pustak — 2025 se pehle wali) (BSEB, Class 6) | अध्याय 10 | प्रकार: एकांकी | माध्यम: हिंदी
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चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): धनुष लिए खड़े एक वृद्ध योद्धा। यह एक सामान्य चित्र है, किताब का दृश्य नहीं।

राजदरबार में पिता के सामने प्रणाम करता एक राजकुमार — त्याग का एक सामान्य चित्र।
अध्याय का सार
यह एक एकांकी है — एक ही अंक वाला नाटक — जिसका आधार ऐतिहासिक संदर्भ है। इसके पात्र हैं: शान्तनु (हस्तिनापुर के सम्राट), भीष्म अर्थात् युवराज देवब्रत, दाशराज (निषादों के राजा), सत्यवती (दाशराज की पुत्री, जिन्हें योजनागन्धा भी कहा गया है), और सैनिक, द्वारपाल, देवगण तथा सत्यवती की सखियाँ।
पहला दृश्य यमुना के निकटवर्ती प्रांत में निषादों के राजा दाशराज के निवास-स्थान का है। दाशराज हस्तिनापुर के महाराजा शान्तनु का स्वागत करते हैं। शान्तनु कहते हैं कि दाशराज उनके मित्र हैं; वे देश की अत्यंत प्राचीन जाति के राजा हैं, और उनके पूर्वज निषादराज गुह को भगवान रामचंद्र का सखा होने का गौरव प्राप्त था। शान्तनु इस संबंध को, इस स्नेह-सूत्र को और भी दृढ़ बनाने के विचार से आए हैं — वे दाशराज की परम सुंदरी कन्या योजनागन्धा-सत्यवती को हस्तिनापुर की राजरानी बनाना चाहते हैं। दाशराज कहते हैं कि यह उनका परम सौभाग्य होगा, पर निषादकन्या राजरानी पद का बोझ कैसे उठा सकेगी? शान्तनु कहते हैं कि उनकी कन्या नारी-रत्न है — वह संसार के बड़े से बड़े सम्राट की राजरानी होने के योग्य है, अपनी सुंदरता से उर्वशी और मेनका को लजाती हुई इंद्रपुरी की भी शोभा बढ़ा सकती है; और इस विवाह से दो जातियों का हृदय भी जुड़ेगा, निषाद मित्र बनकर हस्तिनापुर के राज्य की शक्ति बढ़ाएँगे। दाशराज कहते हैं कि भरत-कुल से संबंध होने से उनका गौरव बढ़ेगा ही, परंतु — वे नहीं चाहते कि उनकी कन्या की संतान हस्तिनापुर के युवराज की सामंत बने। वीरों में श्रेष्ठ, अस्त्र-विद्या में पारंगत युवराज देवब्रत के रहते हुए दूसरा रास्ता ही क्या है! शान्तनु पूछते हैं कि साफ़ कहिए, आप क्या चाहते हैं? दाशराज कहते हैं कि वे चाहते हैं कि शान्तनु के बाद सत्यवती का पुत्र हस्तिनापुर की राजगद्दी पर बैठे; नहीं तो इस विवाह का केवल एक अर्थ होगा — या तो सत्यवती की संतान के लिए दासता, अथवा बलवान के साथ शत्रुता। शान्तनु कहते हैं कि देवब्रत सर्वथा योग्य और सुशील हैं, प्रजा उन्हें प्यार करती है, राजगद्दी पर उनका अधिकार है — वे ज़रा-सा भी अधिकार से उन्हें वंचित नहीं कर सकते। दाशराज कहते हैं कि तब क्षमा करें — वे सत्यवती को हस्तिनापुर के भावी महाराज की सेवा हेतु दासों की संख्या में वृद्धि करने के लिए नहीं भेज सकते; और यह भी कि देवब्रत या उनकी संतान भी इतनी ही उदार होगी, इसका विश्वास वे कैसे करें? शान्तनु मानते हैं कि दाशराज ठीक कह रहे हैं, लेकिन उनका कहना मानने का अर्थ है युवराज देवब्रत के साथ अन्याय — वे अपने देवता-तुल्य पुत्र के साथ ऐसा अन्याय नहीं कर सकते। शान्तनु उदास मन उठकर चले जाते हैं; निषादराज उन्हें आदरपूर्वक विदा करने के लिए बाहर तक जाते हैं, जहाँ महाराज का रथ खड़ा है। पर्दा गिरता है।
दूसरा दृश्य दाशराज के घर का है। दाशराज की पुरी में फिर हलचल है — आज पुरी में हस्तिनापुर के राजकुमार देवब्रत पधारे हैं, उनके साथ कुछ सामंत और नौकर-चाकर भी हैं। दाशराज उनका स्वागत करते हैं — जिनके वाणों की बौछार से गंगा की धारा रुक गई थी, जिनकी वीर भुजाओं की छाया में हस्तिनापुर की प्रजा सुख की नींद सोती है, जिनसे मित्रता करने के लिए देव, गंधर्व, यक्ष सब लालायित रहते हैं, ऐसे वीर शिरोमणि देवब्रत का निषादपुरी में स्वागत है। देवब्रत कहते हैं कि वे आज्ञा देने नहीं आए हैं, प्रार्थना करने आए हैं — वे माँ सत्यवती को हस्तिनापुर ले जाने के लिए आए हैं। पिताजी जब से यहाँ से गए हैं, उदास हैं; वे आज राजदरबार में भी नहीं आए; देवब्रत पिताजी का दुःख नहीं देख सकते। दाशराज कहते हैं कि महाराज ने देवब्रत से कुछ बताया नहीं — वे उनका दिल दुखाना नहीं चाहते होंगे; और दाशराज की शर्त भी तो असंभव है, उसे मानना देवब्रत के साथ अन्याय करना होगा। देवब्रत शर्त सुनना चाहते हैं; दाशराज निःसंकोच कहते हैं कि उन्होंने महाराज से कहा था कि वे सत्यवती का विवाह तभी करेंगे, जब उसका पुत्र ही हस्तिनापुर की राजगद्दी पर बैठे। देवब्रत कहते हैं कि उन्हें यह शर्त मंजूर है — वे प्रतिज्ञा करते हैं कि वे हस्तिनापुर की राजगद्दी पर नहीं बैठेंगे; सत्यवती का पुत्र, उनका भाई ही गद्दी पर बैठेगा, और वे उसकी वैसे ही सेवा करेंगे जैसे आज हस्तिनापुर के सम्राट की कर रहे हैं। दाशराज कहते हैं कि देवब्रत निश्चय ही अपनी प्रतिज्ञा का पालन करेंगे, इसमें ज़रा भी संदेह नहीं है — परंतु क्या उनकी संतान भी इसका पालन करेगी? ऐसा न हो कि यह विवाह झगड़े की जड़ बन जाए, और यह बहुत बुरा होगा, क्योंकि तब वह दो जातियों का झगड़ा बन जाएगा। (इस स्थल का बीच का संवाद स्कैन में धुंधला है; यहाँ उसका भाव-स्तर का सार दिया गया है।) देवब्रत दाशराज की बात मानते हैं, पर वे दो जातियों और दो कुलों का मेल-मिलाप चाहते हैं — इसमें देश का भला है। उन्हें एक साथ दो पुण्य कार्य करने का अवसर मिल रहा है: पिताजी को सुखी बनाने का और दो कुलों को जोड़ने का। वे बड़े से बड़ा त्याग करके भी इस पवित्र कर्तव्य का पालन करेंगे — निषादराज, वे प्रतिज्ञा करते हैं कि वे विवाह ही नहीं करेंगे। दाहिना हाथ ऊपर उठाकर वे आकाश के सूर्य-चंद्र, अंतरिक्ष के देवता, सब चीज़ों को धारण करने वाली पृथ्वी, संसार की प्रत्येक वस्तु में रहने वाली अग्नि और दसों दिशाओं के दिकपालों को साक्षी करके कहते हैं कि देवब्रत आजीवन ब्रह्मचारी रहेगा। प्रतिज्ञा सुनकर निषादराज अवाक् रह जाते हैं; आकाश से फूलों की वर्षा होती है और ध्वनि आती है — ‘भीष्म-भीष्म-देवब्रत — ऐसी प्रतिज्ञा करने वाला न अब तक पैदा हुआ है, न होगा — आज से तुम्हारा नाम ‘भीष्म’ हुआ।’ दाशराज प्रसन्न होकर कहते हैं कि अब उन्हें कुछ नहीं कहना है; महाराज शान्तनु की आज्ञा उन्हें शिरोधार्य है। भीष्म कहते हैं कि तो बुलाइए माताजी को; बाहर रथ तैयार है, वे उन्हें साथ ही ले जाएँगे। सखियों से घिरी सत्यवती घर से निकलती हैं; भीष्म सत्यवती का पैर छूते हैं। पर्दा गिरता है।
तुम्हें क्या सीखना चाहिए
इस एकांकी से दोनों दृश्यों का क्रम सीखो — शान्तनु का प्रस्ताव और दाशराज की शर्त (सत्यवती का पुत्र ही गद्दी पर बैठे), शान्तनु की कठिनाई (देवब्रत योग्य, अधिकार, अन्याय), देवब्रत की दो प्रतिज्ञाएँ (गद्दी पर न बैठना; आजीवन ब्रह्मचर्य) और ‘भीष्म’ नाम पड़ने का कारण (भयंकर/दृढ़ प्रतिज्ञा — ऐसी प्रतिज्ञा करने वाला न अब तक पैदा हुआ, न होगा)। शब्दार्थ याद रखो (प्रतिज्ञा–शपथ, पारंगत–निपुण, सामंत–ज़मींदार, अस्त्र–फेंककर चलाया जाने वाला हथियार, श्रेष्ठ–उत्तम, सम्राट–राजा) और समोच्चारित शब्दों के अंतर सीखो।
मुख्य शब्द
- प्रतिज्ञा — शपथ; दृढ़ संकल्प
- पारंगत — निपुण; किसी विद्या में पूर्ण दक्ष
- सामंत — ज़मींदार; राजा के अधीन छोटा शासक
- अस्त्र — फेंककर चलाया जाने वाला हथियार
- श्रेष्ठ — उत्तम; सबसे अच्छा
- सम्राट — राजा; बड़े राज्य का शासक
- एकांकी — एक अंक वाला नाटक
- योजनागन्धा — सत्यवती का एक नाम (योजन तक गंध फैलने वाली)
- ब्रह्मचारी — आजीवन विवाह न करने का व्रत लेने वाला
- शिरोधार्य — सिर पर धारण करने योग्य; सहर्ष स्वीकार
याद रखें
- एकांकी: ‘भीष्म की प्रतिज्ञा’; लेखक: वंशीधर श्रीवास्तव; आधार: ऐतिहासिक संदर्भ।
- पात्र: शान्तनु (हस्तिनापुर के सम्राट), देवब्रत/भीष्म (युवराज), दाशराज (निषादों के राजा), सत्यवती (दाशराज की पुत्री)।
- पहला दृश्य: यमुना के निकटवर्ती प्रांत में दाशराज का निवास-स्थान; शान्तनु सत्यवती को राजरानी बनाना चाहते हैं।
- दाशराज की शर्त: शान्तनु के बाद सत्यवती का पुत्र ही राजगद्दी पर बैठे; नहीं तो संतान के लिए दासता या बलवान से शत्रुता।
- शान्तनु की कठिनाई: देवब्रत योग्य, सुशील, प्रजा के प्रिय, गद्दी पर अधिकार — उन्हें वंचित करना अन्याय होगा।
- दूसरा दृश्य: दाशराज का घर; देवब्रत पिताजी का दुःख देखकर माँ सत्यवती को ले जाने आए हैं।
- पहली प्रतिज्ञा: गद्दी पर नहीं बैठूँगा; सत्यवती का पुत्र (भाई) ही गद्दी पर बैठेगा; उसकी सेवा करूँगा।
- दाशराज का संदेह: क्या देवब्रत की संतान भी पालन करेगी? विवाह झगड़े की जड़ न बन जाए।
- दूसरी प्रतिज्ञा: विवाह ही नहीं करूँगा; सूर्य-चंद्र, देवता, पृथ्वी, अग्नि, दिकपालों को साक्षी करके आजीवन ब्रह्मचारी रहूँगा।
- ‘भीष्म’ नाम: आकाशवाणी — ऐसी प्रतिज्ञा करने वाला न अब तक पैदा हुआ है, न होगा; आज से तुम्हारा नाम ‘भीष्म’ हुआ।
- अंत: दाशराज की आज्ञा शिरोधार्य; रथ तैयार; सत्यवती सखियों से घिरी निकलती हैं; भीष्म पैर छूते हैं।
परीक्षा टिप / सामान्य गलती
सामान्य गलती: दोनों प्रतिज्ञाओं को एक समझ लेना — पहली प्रतिज्ञा गद्दी पर न बैठना है, दूसरी (बड़ी) प्रतिज्ञा विवाह न करना / आजीवन ब्रह्मचर्य है; ‘भीष्म’ नाम दूसरी प्रतिज्ञा पर पड़ा। दूसरी गलती: शर्त को शान्तनु की शर्त बताना — शर्त दाशराज की थी। तीसरी गलती: सत्यवती को शान्तनु की पुत्री लिखना — सत्यवती दाशराज की पुत्री हैं। चौथी गलती: मिलान में शान्तनु-भीष्म-दाशराज-सत्यवती को आपस में मिला देना — क्रम याद रखो: शान्तनु–सम्राट, भीष्म–युवराज, दाशराज–निषादों के राजा, सत्यवती–दाशराज की पुत्री।
सारणी / चार्ट: एकांकी के दो दृश्य
| दृश्य | स्थान | मुख्य बात | परिणाम |
|---|---|---|---|
| पहला | यमुना के निकट दाशराज का निवास-स्थान | शान्तनु का विवाह-प्रस्ताव; दाशराज की शर्त (सत्यवती का पुत्र ही गद्दी पर बैठे) | शान्तनु शर्त मान नहीं सकते (देवब्रत के साथ अन्याय होगा); उदास लौटते हैं |
| दूसरा | दाशराज का घर | देवब्रत का आना; पहली प्रतिज्ञा (गद्दी त्याग); दाशराज का संतान-संदेह; दूसरी प्रतिज्ञा (ब्रह्मचर्य) | आकाशवाणी — ‘भीष्म’ नाम; विवाह स्वीकृत; सत्यवती रथ पर हस्तिनापुर जाती हैं |
अभ्यास — खुद करके देखो
- दाशराज की शर्त क्या थी? वह शर्त क्यों रखी गई थी?
संकेत: संतान के भविष्य — दासता या शत्रुता — के बारे में सोचो। - देवब्रत की दोनों प्रतिज्ञाओं में क्या अंतर है? दोनों को अलग-अलग लिखो।
संकेत: गद्दी-त्याग और ब्रह्मचर्य — दोनों सोचो। - ‘भीष्म’ नाम क्यों पड़ा? आकाशवाणी के शब्दों से समझाओ।
संकेत: ‘ऐसी प्रतिज्ञा करने वाला न अब तक पैदा हुआ है, न होगा’ — इस वाक्य को याद करो। - शान्तनु को शर्त मानने में क्या कठिनाई थी? अपने शब्दों में लिखो।
संकेत: देवब्रत की योग्यता और अधिकार के बारे में सोचो। - अगर तुम भीष्म की जगह होते, तो क्या करते? अपना मत कारण सहित लिखो।
संकेत: अपने अनुभव से जोड़कर लिखो; त्याग और न्याय दोनों पक्ष सोचो।
प्रश्नोत्तर
- शान्तनु कहाँ के महाराजा थे?
शान्तनु हस्तिनापुर के सम्राट (महाराजा) थे — भरत-कुल में श्रेष्ठ हस्तिनापुर के राजा। - निषादराज ने राजा से अपनी कन्या के विवाह के लिए क्या शर्त रखी?
शर्त यह थी कि शान्तनु के बाद सत्यवती का पुत्र ही हस्तिनापुर की राजगद्दी पर बैठे। दाशराज नहीं चाहते थे कि उनकी कन्या की संतान युवराज की सामंत बने — नहीं तो विवाह का अर्थ संतान के लिए दासता या बलवान के साथ शत्रुता होता। - राजा को निषादराज की शर्त मानने में क्या कठिनाई थी?
कठिनाई यह थी कि युवराज देवब्रत वीरों में श्रेष्ठ, अस्त्र-विद्या में पारंगत, सर्वथा योग्य और सुशील थे; प्रजा उन्हें प्यार करती थी और राजगद्दी पर उनका अधिकार था। शर्त मानने का अर्थ देवब्रत के साथ अन्याय होता, और शान्तनु अपने देवता-तुल्य पुत्र के साथ ऐसा अन्याय नहीं कर सकते थे। - देवब्रत ने हस्तिनापुर की गद्दी पर नहीं बैठने की प्रतिज्ञा क्यों की?
क्योंकि वे पिताजी का दुःख नहीं देख सकते थे — पिताजी दाशराज के यहाँ से लौटकर उदास थे, दरबार में भी नहीं आए थे। पिताजी को सुखी बनाने और दो कुलों को जोड़ने के लिए उन्होंने गद्दी-त्याग की प्रतिज्ञा की, ताकि सत्यवती का पुत्र गद्दी पर बैठ सके और विवाह हो सके। - देवब्रत का नाम भीष्म क्यों पड़ा?
क्योंकि उन्होंने भयंकर (अत्यंत दृढ़) प्रतिज्ञा की — विवाह ही न करने और आजीवन ब्रह्मचारी रहने की, सूर्य-चंद्र, देवता, पृथ्वी, अग्नि और दिकपालों को साक्षी करके। आकाश से फूलों की वर्षा हुई और ध्वनि आई कि ऐसी प्रतिज्ञा करने वाला न अब तक पैदा हुआ है, न होगा — आज से तुम्हारा नाम ‘भीष्म’ हुआ।
किताब के अभ्यास — विस्तार सहित प्रश्नोत्तर
किताब के ‘प्रश्न-अभ्यास’ खंड से, EG के अपने शब्दों में उत्तर। व्यक्तिगत प्रश्नों के उत्तर अपने अनुभव से लिखने हैं।
- पाठ से 1 — शान्तनु कहाँ के महाराजा थे?
हस्तिनापुर के सम्राट (महाराजा)। - पाठ से 2 — निषादराज ने राजा से अपनी कन्या के विवाह के लिए क्या शर्त रखी?
यही कि शान्तनु के बाद सत्यवती का पुत्र ही हस्तिनापुर की राजगद्दी पर बैठे। - पाठ से 3 — राजा को निषादराज की शर्त मानने में क्या कठिनाई थी?
देवब्रत योग्य, सुशील और प्रजा के प्रिय थे; गद्दी पर उनका अधिकार था — शर्त मानना उनके साथ अन्याय होता। - पाठ से 4 — देवब्रत ने हस्तिनापुर की गद्दी पर नहीं बैठने की प्रतिज्ञा क्यों की?
पिताजी को सुखी बनाने और दो कुलों को जोड़ने के लिए — पिताजी का दुःख वे नहीं देख सकते थे। - पाठ से 5 — देवब्रत का नाम भीष्म क्यों पड़ा?
भयंकर ब्रह्मचर्य-प्रतिज्ञा के कारण — आकाशवाणी ने कहा कि ऐसी प्रतिज्ञा करने वाला न अब तक पैदा हुआ है, न होगा; आज से तुम्हारा नाम ‘भीष्म’ हुआ। - पाठ से 6 — देवब्रत ने दाशराज की शर्त क्यों मान ली? सही कथन के आगे सही का निशान लगाइए।
(घ) वह अपने पिताजी को सुखी देखना चाहते थे — यही सही है। (क) गलत — राजा न होना उनकी इच्छा नहीं, त्याग का माध्यम था। (ख) आंशिक — निषादराज को प्रसन्न करना उद्देश्य नहीं, पिताजी को सुखी बनाना और दो कुलों को जोड़ना उद्देश्य था। (ग) गलत — यश कमाना उद्देश्य नहीं था; यश प्रतिज्ञा का परिणाम था। - पाठ से 7 — मिलान करें।
शान्तनु — हस्तिनापुर के सम्राट; भीष्म — हस्तिनापुर के युवराज; दाशराज — निषादों के राजा; सत्यवती — दाशराज की पुत्री। - पाठ से आगे 1 — अगर आप भीष्म की जगह होते, तो क्या करते?
(अपना उत्तर लिखो — जैसे: मैं भी पिताजी के सुख के लिए त्याग करता, या मैं दूसरा रास्ता खोजता — अपना मत कारण सहित लिखो।) - पाठ से आगे 2 — इस एकांकी का कौन-सा पात्र आपको अच्छा लगा? क्यों?
(अपना उत्तर लिखो — जैसे: भीष्म, क्योंकि उन्होंने पिताजी के सुख और दो कुलों के मेल के लिए सबसे बड़ा त्याग किया; या दाशराज, क्योंकि उन्होंने अपनी बेटी के भविष्य की चिंता की। पात्र और कारण दोनों लिखो।) - पाठ से आगे 3 — हस्तिनापुर को वर्तमान में क्या कहा जाता है?
हस्तिनापुर वर्तमान में भी हस्तिनापुर नाम से ही जाना जाता है — उत्तर प्रदेश के मेरठ ज़िले में स्थित एक नगर। (नोट: यह उत्तर एकांकी के पाठ में नहीं है; सामान्य भूगोल-तथ्य के रूप में दिया गया है।) - पाठ से आगे 4 — दाशराज की शर्त आपको उचित या अनुचित लगी? क्यों?
(अपना उत्तर लिखो — जैसे: उचित लगी, क्योंकि कोई पिता अपनी बेटी की संतान का भविष्य अंधकार में नहीं छोड़ना चाहता; या अनुचित लगी, क्योंकि देवब्रत योग्य थे और उनसे अधिकार छीनना अन्याय था। अपना मत कारण सहित लिखो।) - व्याकरण 1(क) — वाक्य-प्रयोग द्वारा अंतर: कुल / कूल।
कुल = वंश, परिवार — ‘देवब्रत भरत-कुल के युवराज थे।’ कूल = किनारा — ‘यमुना के कूल पर निषादों का निवास था।’ - व्याकरण 1(ख) — वाक्य-प्रयोग द्वारा अंतर: नारी / नाड़ी।
नारी = स्त्री — ‘सत्यवती नारी-रत्न कही गई हैं।’ नाड़ी = नस, नब्ज़ — ‘वैद्य ने रोगी की नाड़ी देखी।’ - व्याकरण 1(ग) — वाक्य-प्रयोग द्वारा अंतर: अस्त्र / शस्त्र।
अस्त्र = फेंककर चलाया जाने वाला हथियार — ‘देवब्रत अस्त्र-विद्या में पारंगत थे।’ शस्त्र = हाथ में पकड़कर चलाया जाने वाला हथियार — ‘योद्धा ने शस्त्र उठाया।’ - व्याकरण 1(घ) — वाक्य-प्रयोग द्वारा अंतर: पुरी / पूरी।
पुरी = नगरी, नगर — ‘देवब्रत निषादपुरी में पधारे।’ पूरी = समूची — ‘पूरी प्रजा देवब्रत को प्यार करती थी।’ - व्याकरण 1(ङ) — वाक्य-प्रयोग द्वारा अंतर: सेवा / शुश्रूषा।
सेवा = सेवा करना (सामान्य) — ‘देवब्रत ने सत्यवती के पुत्र की सेवा करने की प्रतिज्ञा की।’ शुश्रूषा = बड़ों की सेवा-टहल — ‘पुत्र ने माता-पिता की शुश्रूषा की।’ - व्याकरण 2 — निवास-स्थान में योजक चिह्न (-) लगा है; इस तरह के अन्य उदाहरण पाठ से चुनकर लिखिए।
निवास-स्थान के अतिरिक्त पाठ में: स्नेह-सूत्र, देवता-तुल्य, मेल-मिलाप, सेवा-हेतु — इन सभी में योजक चिह्न (-) दो शब्दों को जोड़ता है। - व्याकरण 3 — उदाहरण के अनुसार लिखें: महाराज, युवराज, निषादराज, दाशराज।
इन शब्दों में ‘राज’ जुड़ा है: महाराज = महा + राज; युवराज = युवराज (युवा + राज); निषादराज = निषाद + राज; दाशराज = दाश + राज। (नोट: किताब के इस प्रश्न का पूरा पैटर्न स्कैन में अस्पष्ट है; यहाँ ‘राज’ वाले शब्दों का विग्रह दिया गया है — किताब से मिलान करके पक्का करो।) - कुछ करने को 1 — इस एकांकी का अभिनय बाल-सभा में कीजिए।
(गतिविधि: शान्तनु, देवब्रत, दाशराज, सत्यवती के पात्र बाँटकर, दोनों दृश्यों सहित, एकांकी का अभिनय बाल-सभा में करो।) - कुछ करने को 2 — महाभारत के कुछ महारथियों के नाम मालूम कीजिए।
(खोज-कार्य: महाभारत के महारथियों — जैसे भीष्म, द्रोण, कर्ण, अर्जुन — के नाम और उनकी विशेषताएँ मालूम करके लिखो।)
इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: सार पढ़ें, मुख्य शब्द अपने शब्दों में बोलें, फिर बिना देखे अभ्यास करके देखें। प्रश्नोत्तर से अपने आप को जाँचें। अपने उत्तर शिक्षक या माता-पिता से जाँचवाएँ।

