विधायिका
संसद कैसे काम करती है, विधायिका कार्यपालिका पर कैसे नियंत्रण रखती है और संसदीय समितियाँ क्यों ज़रूरी हैं — पूरा अध्याय।
Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 11 • Political Science • Book: Bharat ka Samvidhan: Siddhant aur Vyavahar (Purani pustak — 2025 se pehle wali)
विधायिका — EG के अपने नोट्स, सरल शब्दों में
पुस्तक: Bharat ka Samvidhan: Siddhant aur Vyavahar (Purani pustak — 2025 se pehle wali) (BSEB, Class 11) | अध्याय 5 | माध्यम: हिंदी
यह पृष्ठ Educational Galaxy के अपने मूल नोट्स हैं — अध्याय का विषय-स्तरीय सार, किताब की नकल नहीं। यहाँ कोई आधिकारिक BSTBPC PDF नहीं दिया जाता है।
अध्याय का सार
विधायिका सरकार का वह अंग है जो कानून बनाता है। भारत की संसद द्विसदनीय है — लोकसभा (निम्न सदन, जनता द्वारा सीधे चुनी गई) और राज्यसभा (उच्च सदन, राज्यों का प्रतिनिधित्व)। कानून बनाने के लिए विधेयक को दोनों सदनों से पारित होकर राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलनी चाहिए।
लोकसभा अधिक शक्तिशाली है — धन विधेयक वहीं शुरू होता है और सरकार उसी के प्रति उत्तरदायी है। विधायिका सिर्फ कानून नहीं बनाती; वह बजट पास करती है, सरकार पर नियंत्रण रखती है (प्रश्नकाल, अविश्वास प्रस्ताव) और जनता की आवाज़ का मंच है।
विधायिका के कार्य
विधायिका (संसद) के चार मुख्य कार्य हैं — कानून बनाना, कार्यपालिका पर नियंत्रण रखना, जनता की आवाज़ को मंच देना और बजट (वित्त) पर नियंत्रण। लोकसभा और राज्यसभा मिलकर संसद बनती हैं; धन विधेयक केवल लोकसभा में शुरू हो सकता है।
संसद केवल कानून बनाने की मशीन नहीं है — वह वह मंच है जहाँ देश के हर हिस्से की आवाज़ पहुँचती है। प्रश्नकाल, बहसें और समितियाँ इसी मंच के औज़ार हैं।
कार्यपालिका पर नियंत्रण
संसद कार्यपालिका पर कई तरीकों से नियंत्रण रखती है — प्रश्न पूछना, अविश्वास प्रस्ताव, बजट की स्वीकृति और समितियों की जाँच। लोकसभा का नियंत्रण राज्यसभा से अधिक प्रभावी है क्योंकि सरकार लोकसभा के विश्वास पर टिकी होती है और धन विधेयकों पर लोकसभा की राय अंतिम होती है।
द्विसदनीय व्यवस्था (दो सदन) की उपयोगिता यह है कि दूसरा सदन जल्दबाज़ी में बने कानूनों की समीक्षा करता है, राज्यों का प्रतिनिधित्व करता है (राज्यसभा) और विशेषज्ञों की राय (मनोनीत सदस्य) लाता है।
विधेयक से कानून तक और संसदीय समितियाँ
साधारण विधेयक की यात्रा: संबंधित मंत्रालय मसौदा तैयार करता है, मंत्री उसे सदन में पेश करता है, चर्चा होती है, समिति को भेजा जाता है, धारा-वार मतदान होता है, एक सदन से पारित होकर दूसरे सदन में जाता है और अंत में राष्ट्रपति की स्वीकृति से कानून बनता है।
संसदीय समितियाँ (जैसे स्थायी समितियाँ, लोक लेखा समिति) विधेयकों और सरकारी खर्च की गहराई से जाँच करती हैं। समितियों में सभी दलों के सदस्य होते हैं और वहाँ दलीय राजनीति से ऊपर उठकर विशेषज्ञता से काम होता है — इसलिए समितियाँ संसद की 'कार्यशाला' कहलाती हैं।
मुख्य बिंदु
- संसद: लोकसभा + राज्यसभा + राष्ट्रपति।
- धन विधेयक: सिर्फ लोकसभा में शुरू।
- नियंत्रण: प्रश्नकाल, बहस, अविश्वास प्रस्ताव।
- लोकसभा का कार्यपालिका पर नियंत्रण राज्यसभा से अधिक है — सरकार लोकसभा के विश्वास पर टिकी है और धन विधेयक पर लोकसभा की राय अंतिम है।
- दूसरा सदन जल्दबाज़ी के कानूनों की समीक्षा करता है और राज्यों का प्रतिनिधित्व करता है।
- समितियाँ संसद की 'कार्यशाला' हैं — वहाँ दलीय राजनीति से ऊपर उठकर विशेषज्ञता से काम होता है।
तालिका / चार्ट — एक नज़र में
| विषय | मुख्य बात |
|---|---|
| लोकसभा | सीधे चुनी गई, 5 वर्ष |
| राज्यसभा | राज्यों का सदन, स्थायी |
| विधेयक | कानून का प्रस्ताव |
| धन विधेयक | सिर्फ लोकसभा में |

चित्र 1 (सामान्य चित्रण, किताब का चित्र नहीं): विधायिका का सामान्य चित्रण — संसद भवन और बहस कक्ष। यह किताब का चित्र नहीं है।

चित्र 2 (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): लेबल वाला प्रवाह चित्र: कानून बनाने की प्रक्रिया।

नया चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): विधेयक से कानून तक की यात्रा — मसौदा, चर्चा, समिति, मतदान, दूसरा सदन, राष्ट्रपति की स्वीकृति।
Key Terms — मुख्य शब्द
- विधायिका: कानून बनाने वाला अंग।
- द्विसदनीय: दो सदनों वाली व्यवस्था।
- विधेयक: कानून बनने से पहले का प्रस्ताव।
- धन विधेयक: कर-खर्च से जुड़ा विधेयक।
- प्रश्नकाल: सरकार से सवाल पूछने का समय।
- धन विधेयक (Money Bill) — कर, सरकारी खर्च और उधारी से जुड़ा विधेयक; केवल लोकसभा में शुरू होता है, राज्यसभा केवल 14 दिन में सुझाव दे सकती है।
- अविश्वास प्रस्ताव — लोकसभा में सरकार के विरुद्ध प्रस्ताव; पारित होने पर सरकार को इस्तीफ़ा देना पड़ता है।
- दल-बदल विरोधी कानून (52वाँ संशोधन, 1985) — दल बदलने वाले सदस्य की सदस्यता समाप्त हो जाती है; इससे दल के नेताओं की शक्ति बढ़ी है।
Remember — याद रखें
- लोकसभा बनाम राज्यसभा की शक्ति का फर्क (धन विधेयक, उत्तरदायित्व) लिखें।
- कानून बनने की प्रक्रिया क्रम से लिखें।
- विधायिका के तीन काम — कानून, बजट, नियंत्रण — तीनों लिखें।
- राज्यसभा स्थायी सदन है, भंग नहीं होती।
Exam Tip / Common Mistake — परीक्षा टिप / सामान्य गलती
सामान्य गलती: दोनों सदनों को बराबर शक्तिशाली मान लेना। उत्तर में लोकसभा की विशेष शक्तियाँ लिखें।
अभ्यास — Practice set (स्वयं करके देखें)
- विधायिका क्या करती है?
संकेत: कानून बनाने के बारे में सोचें। - संसद के दो सदन कौन से हैं?
संकेत: लोकसभा और राज्यसभा के बारे में सोचें। - धन विधेयक कहाँ शुरू होता है?
संकेत: लोकसभा के बारे में सोचें। - कानून कैसे बनता है?
संकेत: विधेयक से स्वीकृति तक के बारे में सोचें। - विधायिका सरकार पर नियंत्रण कैसे रखती है?
संकेत: प्रश्नकाल के बारे में सोचें।
प्रश्न और उत्तर — Questions with Answers
- विधायिका क्या है?
सरकार का कानून बनाने वाला अंग; भारत में संसद — लोकसभा, राज्यसभा और राष्ट्रपति। - लोकसभा और राज्यसभा में क्या अंतर है?
लोकसभा जनता द्वारा सीधे चुनी जाती है और 5 वर्ष के लिए होती है; राज्यसभा राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है और स्थायी सदन है। - कानून कैसे बनता है?
विधेयक किसी सदन में पेश होता है, दोनों सदनों से पारित होने के बाद राष्ट्रपति की स्वीकृति से कानून बनता है। - लोकसभा अधिक शक्तिशाली क्यों है?
धन विधेयक सिर्फ वहीं शुरू होता है और सरकार उसी के प्रति उत्तरदायी होती है। - विधायिका के नियंत्रण के साधन क्या हैं?
प्रश्नकाल, बहस, ध्यानाकर्षण और अविश्वास प्रस्ताव।
पुस्तक की प्रश्नावली — Extension Q&A (पुस्तक के अभ्यास प्रश्नों पर आधारित, EG के अपने शब्दों में)
- आलोक का कहना है कि विधायिका केवल कानून बनाने का काम करती है। क्या आप इससे सहमत हैं? कारण दीजिए।
उत्तर: असहमत — कानून बनाना विधायिका का एक ही कार्य है। वह कार्यपालिका पर नियंत्रण रखती है (प्रश्न, अविश्वास प्रस्ताव), जनता की आवाज़ को मंच देती है और बजट पर नियंत्रण रखती है। केवल कानून बनाने वाली संस्था 'विधायिका' नहीं, 'कानून-निर्माण समिति' कहलाती। - नेहा, शमा और त्रिदेव की बहस पर टिप्पणी कीजिए — नेहा: दूसरा सदन बेकार है; शमा: मनोनीत सदस्य विशेषज्ञता लाते हैं; त्रिदेव: दूसरा सदन केवल संघवाद के लिए है।
उत्तर: नेहा गलत हैं — दूसरा सदन समीक्षा और राज्यों के प्रतिनिधित्व के लिए ज़रूरी है। शमा सही हैं — राज्यसभा में 12 मनोनीत विशेषज्ञ सदस्य होते हैं। त्रिदेव आंशिक रूप से सही हैं — संघवाद एक कारण है, पर समीक्षा और विशेषज्ञता भी दूसरे सदन के उद्देश्य हैं। - लोकसभा राज्यसभा की तुलना में कार्यपालिका पर अधिक प्रभावी नियंत्रण क्यों रखती है?
उत्तर: तीन कारण — पहला, सरकार लोकसभा के विश्वास पर टिकी होती है, राज्यसभा के नहीं। दूसरा, धन विधेयकों पर लोकसभा की राय अंतिम होती है। तीसरा, लोकसभा सीधे जनता द्वारा चुनी जाती है, इसलिए उसका नियंत्रण अधिक वैध माना जाता है। - क्या संसद जनता की आवाज़ का मंच है? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर: हाँ — संसद में हर क्षेत्र के प्रतिनिधि बैठते हैं, प्रश्नकाल में सरकार से जवाब माँगा जाता है, बहसों में जनता के मुद्दे उठते हैं और बजट पर चर्चा में जनता की प्राथमिकताएँ तय होती हैं। इसलिए संसद लोकतंत्र का सबसे बड़ा सार्वजनिक मंच है। - संसद की कार्यप्रणाली सुधारने के तीन सुझावों पर अपनी राय दीजिए: (क) सत्रों की अवधि बढ़ाना (ख) सदस्यों की उपस्थिति अनिवार्य करना (ग) अध्यक्ष को बाधा डालने वाले सदस्यों को दंडित करने की शक्ति देना
उत्तर: (क) सहमत — लंबे सत्रों से बहस और जाँच के लिए अधिक समय मिलेगा। (ख) आंशिक सहमत — उपस्थिति ज़रूरी है, पर सदस्यों को क्षेत्र का काम भी करना होता है, इसलिए लचीलापन भी चाहिए। (ग) सहमत, पर सावधानी के साथ — अध्यक्ष की शक्ति निष्पक्षता से प्रयोग होनी चाहिए, नहीं तो वह दलीय हथियार बन जाएगी। - आरिफ़ का कहना है कि सरकार के विधेयक लगभग हमेशा पारित हो जाते हैं, इसलिए संसद की भूमिका नगण्य है। इस पर अपनी राय दीजिए।
उत्तर: असहमत — विधेयक पारित होना ही संसद की भूमिका का अंत नहीं है। बहसों से विधेयक सुधरते हैं, समितियाँ खामियाँ निकालती हैं, जनता को जानकारी मिलती है और सरकार को जवाब देना पड़ता है। पारित होने की दर संसद की निष्क्रियता का प्रमाण नहीं है। - दल-बदल विरोधी कानून के बारे में आपकी क्या राय है? (क) इसने दल के नेताओं की शक्ति बढ़ाई है (ख) इसने संसद की स्वतंत्रता घटाई है — किससे अधिक सहमत हैं?
उत्तर: (ख) से अधिक सहमत — दल-बदल विरोधी कानून ने अस्थिरता तो रोकी, पर सदस्यों की स्वतंत्र राय और विवेक पर अंकुश लगा दिया है। अब सदस्य दल के व्हिप के विरुद्ध मतदान नहीं कर सकते, जिससे संसद में स्वतंत्र बहस कम हुई है और दल-नेताओं की शक्ति बढ़ी है। - डॉली और सुई की बहस पर टिप्पणी कीजिए — डॉली: संसद की बहस की गुणवत्ता गिरी है; सुई: लोकसभा ने कई सरकारें गिराई हैं, इसलिए वह कमज़ोर नहीं है।
उत्तर: दोनों के तर्कों में दम है। बहस का समय और गंभीरता घटी है, बाधाएँ बढ़ी हैं — यह चिंता का विषय है। पर लोकसभा ने अविश्वास प्रस्तावों से सरकारें गिराई हैं, जो उसकी शक्ति का प्रमाण है। निष्कर्ष: संसद कमज़ोर नहीं हुई है, पर उसकी बहस की गुणवत्ता सुधारने की ज़रूरत है। - विधेयक के पारित होने की प्रक्रिया के चरणों को सही क्रम में लगाइए: (क) चर्चा के लिए प्रस्ताव पारित (ख) राष्ट्रपति के पास भेजना (ग) दूसरे सदन में भेजना (घ) प्रस्तावक सदन में पारित (ङ) धारा-वार मतदान (च) उप-समिति को भेजना (छ) मंत्री द्वारा विधेयक की ज़रूरत का प्रस्ताव (ज) विधि-विभाग द्वारा विधेयक तैयार करना
उत्तर: सही क्रम — (ज) विधि-विभाग विधेयक तैयार करता है → (छ) मंत्री विधेयक की ज़रूरत का प्रस्ताव करता है → (क) चर्चा के लिए प्रस्ताव पारित होता है → (च) उप-समिति को भेजा जाता है → (ङ) धारा-वार पढ़ा जाता है और मतदान होता है → (घ) प्रस्तावक सदन में पारित होता है → (ग) दूसरे सदन में भेजा जाता है → (ख) राष्ट्रपति के पास स्वीकृति के लिए भेजा जाता है। - संसदीय समितियों की भूमिका पर टिप्पणी लिखिए — वे संसद को कैसे मज़बूत करती हैं?
उत्तर: समितियाँ विधेयकों की बारीकी से जाँच करती हैं, सरकारी खर्च का लेखा-परीक्षण करती हैं और विशेषज्ञों से राय लेती हैं। वहाँ सभी दलों के सदस्य दलीय राजनीति से ऊपर उठकर काम करते हैं। इससे सदन का समय बचता है, कानून बेहतर बनते हैं और कार्यपालिका पर निगरानी मज़बूत होती है।
बोर्ड-पैटर्न अभ्यास — Board-pattern Q&A (EG द्वारा बनाए गए अभ्यास प्रश्न; वास्तविक पिछले वर्षों के प्रश्नपत्र नहीं हैं)
- संसद के किन्हीं दो कार्यों के नाम लिखिए।
कानून बनाना और कार्यपालिका पर नियंत्रण रखना (अन्य — जनता की आवाज़ को मंच देना, बजट पर नियंत्रण)। - धन विधेयक की एक विशेषता बताइए।
धन विधेयक केवल लोकसभा में शुरू हो सकता है; राज्यसभा उसे केवल 14 दिनों में सुझाव सहित लौटा सकती है, रोक नहीं सकती। - अविश्वास प्रस्ताव क्या है?
लोकसभा में सरकार के विरुद्ध लाया गया प्रस्ताव; यदि यह पारित हो जाए तो सरकार को इस्तीफ़ा देना पड़ता है। - राज्यसभा की एक उपयोगिता बताइए।
राज्यसभा जल्दबाज़ी में बने कानूनों की समीक्षा करती है और राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है। - संसदीय समितियाँ क्यों ज़रूरी हैं?
क्योंकि वे विधेयकों और सरकारी खर्च की गहराई से, विशेषज्ञता के साथ जाँच करती हैं — सदन में इतना समय और विशेषज्ञता संभव नहीं होती।
- संसद के कार्य — कानून बनाना, कार्यपालिका पर नियंत्रण, जनता की आवाज़, बजट पर नियंत्रण।
- धन विधेयक केवल लोकसभा में; राज्यसभा 14 दिन में सुझाव दे सकती है।
- नियंत्रण के औज़ार — प्रश्नकाल, अविश्वास प्रस्ताव, बजट स्वीकृति, समितियाँ।
- द्विसदनीयता का लाभ — समीक्षा, राज्यों का प्रतिनिधित्व, विशेषज्ञता।
- विधेयक की यात्रा — मसौदा → पेश → चर्चा → समिति → मतदान → दूसरा सदन → राष्ट्रपति की स्वीकृति।
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