पद्य खंड — Chapter 4: सहजोबाई के पद
सहजोबाई के पद — सहज और सरल भक्ति-भाव, पांडित्य नहीं, सच्चा भाव ही पर्याप्त है।
Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 11 • Hindi • Book: Digant Bhag-1 (Purani pustak — 2025 se pehle wali)
सहजोबाई के पद — EG के अपने नोट्स, सरल शब्दों में
पुस्तक: Digant Bhag-1 (Purani pustak — 2025 se pehle wali) (BSEB, Class 11) | पद्य खंड — अध्याय 4 | प्रकार: पद (भक्ति) (सहजोबाई) | माध्यम: हिंदी
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चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): घर के छोटे मंदिर में प्रार्थना करती भक्तिन — सहज भक्ति का सामान्य चित्र।

बहती निर्मल धारा — सरलता और सहजता का सामान्य चित्र।

नया चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): सहजोबाई के पद — गुरु, भक्ति, सहजता और पद की सरलता।
इस अध्याय के बारे में
सहजोबाई भक्ति-परंपरा की कवयित्री हैं, जिनके पदों में ईश्वर के प्रति सहज और सरल प्रेम व्यक्त हुआ है। उनके पदों में न कठिन दर्शन है, न आडंबर; बल्कि एक सीधी-सादी भक्तिन के हृदय की पुकार है।
सहजोबाई की भाषा सरल और सहज है, इसीलिए उनके पद साधारण पाठक के मन को भी आसानी से छूते हैं। उनके पद बताते हैं कि भक्ति के लिए पांडित्य ज़रूरी नहीं है; सच्चा भाव ही पर्याप्त है।
इस पाठ की सीख यह है कि सरलता भी एक बड़ी शक्ति है। जो बात सीधे हृदय से कही जाती है, वह कठिन शब्दों से कही गई बात से अधिक प्रभावशाली होती है।
क्या सीखना है
सहजोबाई के पदों की सहजता और सरल भक्ति-भाव को समझें।
मुख्य शब्द
- सहज — सरल, स्वाभाविक, बिना बनावट के।
- भक्तिन — ईश्वर की भक्ति करने वाली स्त्री।
- पांडित्य — शास्त्रों का गहरा ज्ञान।
- पुकार — हृदय से की गई प्रार्थना।
- सरलता — सीधापन, बिना कठिनाई के।
याद रखें
- सहजोबाई भक्ति-परंपरा की कवयित्री हैं।
- उनके पदों में सहज और सरल प्रेम है।
- भक्ति के लिए पांडित्य ज़रूरी नहीं है।
- सरलता भी एक बड़ी शक्ति है।
परीक्षा टिप / सामान्य गलती
सामान्य गलती: सहजोबाई को केवल 'मीरा की परंपरा की कवयित्री' लिख देना। परीक्षा में उनकी भाषा की सहजता और सरल भक्ति-भाव भी लिखें।
Chart / Table: सहजोबाई के पद — मुख्य बिंदु
| विषय | विवरण |
|---|---|
| कवयित्री | सहजोबाई |
| परंपरा | भक्ति-परंपरा |
| भाषा | सरल और सहज |
| मुख्य भाव | ईश्वर के प्रति सहज प्रेम |
| संदेश | सच्चा भाव ही पर्याप्त है |
अभ्यास — Practice set (स्वयं करके देखें)
- सहजोबाई के पदों की सबसे बड़ी विशेषता क्या है?
संकेत: संकेत: सहजता और सरलता पर ध्यान दें। - भक्ति के लिए पांडित्य क्यों ज़रूरी नहीं है?
संकेत: संकेत: सच्चे भाव की बात सोचें। - सरलता एक शक्ति कैसे हो सकती है?
संकेत: संकेत: सीधे हृदय से कही बात के प्रभाव की बात सोचें। - सहजोबाई और मीरा की भक्ति में क्या समानता है?
संकेत: संकेत: प्रेम और समर्पण की बात सोचें। - अपने मन की कोई प्रार्थना सरल शब्दों में लिखें।
संकेत: संकेत: कठिन शब्दों से बचें।
प्रश्न और उत्तर
- सहजोबाई कौन थीं?
भक्ति-परंपरा की कवयित्री। - उनके पदों का मुख्य भाव क्या है?
ईश्वर के प्रति सहज और सरल प्रेम। - उनकी भाषा की क्या विशेषता है?
वह सरल और सहज है, इसलिए साधारण पाठक के मन को भी छूती है। - सहजोबाई के अनुसार भक्ति के लिए क्या ज़रूरी है?
पांडित्य नहीं, सच्चा भाव ही पर्याप्त है। - इस पाठ की मुख्य सीख क्या है?
सरलता भी एक बड़ी शक्ति है; हृदय से कही गई बात सबसे अधिक प्रभावशाली होती है।
इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: पहले सार पढ़ें, मुख्य शब्द अपने शब्दों में कहें, फिर बिना देखे अभ्यास करें। अंत में प्रश्न और उत्तर से अपनी जाँच करें। अपने शिक्षक या माता-पिता से उत्तर जँचवाएँ।
विस्तार — ‘सहजोबाई के पद’ को गहराई से समझें
किसी भी पाठ को परीक्षा के लिए तैयार करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि पहले उसका केंद्रीय भाव एक वाक्य में अपने शब्दों में कह सकें, फिर उसके सहायक विचारों को क्रम से जोड़ सकें। ‘सहजोबाई के पद’ का अध्ययन भी इसी क्रम से करें। पहले यह समझें कि इस पाठ का मूल प्रश्न क्या है और लेखक अथवा पाठ किस उत्तर की ओर ले जाता है। जब मूल प्रश्न स्पष्ट हो जाता है, तो पाठ के छोटे-छोटे प्रसंग भी उसी उत्तर के प्रमाण या उदाहरण की तरह दिखने लगते हैं, और उन्हें रटने की आवश्यकता नहीं रहती।
इस पाठ में ‘सहज’ और ‘भक्तिन’ जैसे मुख्य शब्द बार-बार काम आते हैं। इन शब्दों को केवल परिभाषा के रूप में याद करना पर्याप्त नहीं है; यह देखना भी आवश्यक है कि पाठ में ये शब्द किस प्रसंग में आए हैं, इनसे क्या परिणाम निकलता है, और इनके बिना पाठ का तर्क अधूरा क्यों रह जाता है। जो विद्यार्थी शब्दों को प्रसंग के साथ जोड़कर पढ़ता है, वह परीक्षा में प्रश्न के शब्द बदल जाने पर भी उत्तर बना लेता है, क्योंकि उसके पास केवल परिभाषा नहीं, बल्कि पूरी समझ होती है।
पढ़ते समय एक अच्छी आदत यह है कि प्रत्येक अनुच्छेद के बाद रुककर स्वयं से पूछें — इस अनुच्छेद ने केंद्रीय भाव में क्या जोड़ा है? क्या यह कोई नया तर्क है, कोई उदाहरण है, कोई तुलना है, या किसी भ्रम का निराकरण है? इस प्रश्न का उत्तर देते-देते पाठ की रूपरेखा मन में स्वयं बन जाती है। अंत में पूरी रूपरेखा को बिना पुस्तक देखे, अपने शब्दों में, पाँच-सात वाक्यों में लिखकर देखें। जहाँ अटकें, वहीं दोबारा पढ़ें — यही वह स्थान है जहाँ समझ अभी अधूरी है।
मुख्य शब्दों की विस्तृत व्याख्या
नीचे दिए गए प्रत्येक शब्द को परिभाषा, प्रसंग और महत्त्व — तीनों स्तरों पर समझें। यही तीन स्तर परीक्षा के उत्तर को पूरा बनाते हैं।
- सहज — ‘सहज’ का अर्थ है — सरल, स्वाभाविक, बिना बनावट के।। ‘सहजोबाई के पद’ में यह शब्द इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि पाठ का केंद्रीय तर्क इसी धारणा से जुड़ा है। परीक्षा में इस शब्द की परिभाषा के साथ इसका प्रसंग भी लिखें — अर्थात् पाठ में यह कहाँ और क्यों आता है — और अंत में इसका एक परिणाम या महत्त्व जोड़ें। परिभाषा, प्रसंग और महत्त्व — ये तीन कड़ियाँ मिलकर ही पूरा उत्तर बनाती हैं।
- भक्तिन — ‘भक्तिन’ को समझने के लिए पहले इसका शाब्दिक अर्थ देखें — ईश्वर की भक्ति करने वाली स्त्री। — फिर पाठ के प्रसंग में इसका विशेष अर्थ समझें। ‘सहजोबाई के पद’ में यह शब्द पाठक को केंद्रीय भाव की ओर ले जाता है। यदि उत्तर में केवल परिभाषा लिखी जाए, तो वह अधूरा रहता है; परिभाषा के बाद एक वाक्य में यह भी बताएँ कि इस धारणा के होने या न होने से पाठ की स्थिति में क्या अंतर पड़ता है।
- पांडित्य — ‘पांडित्य’ — शास्त्रों का गहरा ज्ञान।। इस शब्द पर विशेष ध्यान इसलिए दें क्योंकि ‘सहजोबाई के पद’ के प्रश्नों में यह बार-बार किसी न किसी रूप में पूछा जाता है — कभी सीधी परिभाषा के रूप में, कभी उदाहरण के रूप में और कभी तुलना के रूप में। उत्तर लिखते समय शब्द को पाठ के मुख्य संदेश से जोड़ें और यह स्पष्ट करें कि लेखक अथवा पाठ इस धारणा के पक्ष में है या इसके विरुद्ध, और क्यों।
- पुकार — ‘पुकार’ का सामान्य अर्थ है — हृदय से की गई प्रार्थना।। परंतु ‘सहजोबाई के पद’ में इसका अर्थ केवल शब्दकोश तक सीमित नहीं है; यहाँ यह पाठ के पूरे तर्क की एक कड़ी है। इसे याद करने का सरल तरीका है — शब्द, उसका प्रसंग और उसका परिणाम — तीनों को एक साथ एक वाक्य-समूह में बाँधकर पढ़ें। जब तीनों कड़ियाँ एक साथ याद रहती हैं, तो परीक्षा में उत्तर अपने आप क्रमबद्ध बनता है।
- सरलता — ‘सरलता’ का अर्थ है — सीधापन, बिना कठिनाई के।। ‘सहजोबाई के पद’ में यह शब्द इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि पाठ का केंद्रीय तर्क इसी धारणा से जुड़ा है। परीक्षा में इस शब्द की परिभाषा के साथ इसका प्रसंग भी लिखें — अर्थात् पाठ में यह कहाँ और क्यों आता है — और अंत में इसका एक परिणाम या महत्त्व जोड़ें। परिभाषा, प्रसंग और महत्त्व — ये तीन कड़ियाँ मिलकर ही पूरा उत्तर बनाती हैं।
रचना की भाषा और शैली — कैसे पढ़ें
गद्य, पद्य और कथा — तीनों की पढ़ने की विधि अलग होती है। गद्य में तर्क का क्रम पकड़ना सबसे महत्त्वपूर्ण है: लेखक पहले क्या स्थापित करता है, फिर किस उदाहरण या तुलना से उसे पुष्ट करता है, और अंत में किस निष्कर्ष पर पहुँचता है। पद्य में भाव और बिंब पकड़ना महत्त्वपूर्ण है: कवि किस चित्र के माध्यम से अपना भाव व्यक्त करता है, और वह चित्र पाठक के मन में क्या प्रभाव छोड़ता है। कथा में पात्र, घटना और परिणाम का क्रम पकड़ना महत्त्वपूर्ण है: कौन-सा पात्र किस स्थिति में क्या करता है, और उससे क्या सीख निकलती है।
इस पाठ को पढ़ते समय भाषा के उन शब्दों पर भी ध्यान दें जो भाव को विशेष रंग देते हैं — जैसे तुलना, विरोधाभास, प्रश्न और दोहराव। लेखक अथवा कवि जब किसी बात पर बल देना चाहता है, तो वह उसे दोहराता है, किसी परिचित वस्तु से तुलना करता है, या प्रश्न के रूप में प्रस्तुत करता है। इन युक्तियों को पहचान लेने से पाठ का भाव अधिक स्पष्ट होता है और उत्तर में भाषा-संबंधी प्रश्नों का सामना करना आसान हो जाता है।
एक उपयोगी अभ्यास यह है कि पाठ के किसी एक अनुच्छेद या पद्यांश को अपनी भाषा में, बिना मूल शब्दों की नकल किए, दो-तीन वाक्यों में लिखें। फिर मूल से मिलाकर देखें कि केंद्रीय भाव छूटा तो नहीं है। यह अभ्यास न केवल समझ को गहरा करता है, बल्कि परीक्षा में ‘अपने शब्दों में उत्तर दीजिए’ जैसे प्रश्नों के लिए सीधी तैयारी भी है।
परीक्षा में कैसे लिखें — उत्तर-लेखन की कला
‘सहजोबाई के पद’ जैसे पाठों पर प्रश्न प्रायः तीन प्रकार के आते हैं — सीधा तथ्य या परिभाषा पूछने वाले, केंद्रीय भाव या कारण पूछने वाले, और अपने शब्दों में सार या मत पूछने वाले। तीनों के उत्तर की संरचना एक ही है: भूमिका, मुख्य भाग और निष्कर्ष। भूमिका में एक वाक्य में विषय का परिचय दें — पाठ किस बारे में है। मुख्य भाग में दो से चार बिंदु क्रम से लिखें — प्रत्येक बिंदु एक अलग तर्क, उदाहरण या परिणाम हो। निष्कर्ष में एक वाक्य में पाठ का संदेश या महत्त्व लिखें।
अंकों के अनुसार उत्तर की लंबाई तय करें। एक-दो अंक के प्रश्न में केवल परिभाषा और एक उदाहरण पर्याप्त है। तीन-चार अंक के प्रश्न में परिभाषा के साथ प्रसंग और एक-दो परिणाम जोड़ें। पाँच अंक के लंबे प्रश्न में भूमिका, तीन-चार बिंदु, एक तुलना या उदाहरण, और निष्कर्ष — सब कुछ होना चाहिए। उत्तर को अनुच्छेदों में बाँटें; एक ही लंबे अनुच्छेद में सब कुछ लिख देने से उत्तर भले ही सही हो, परंतु पढ़ने में कठिन लगता है।
उत्तर में पाठ के मुख्य शब्दों का सही प्रयोग करें, परंतु मूल पाठ की पंक्तियों की नकल न करें। परीक्षक यह देखना चाहता है कि आपने समझा है — और समझ अपने शब्दों में ही दिखती है। उत्तर लिखने के बाद उसे एक बार पढ़कर देखें: क्या पहला वाक्य प्रश्न का सीधा उत्तर देता है? क्या बिंदु क्रम में हैं? क्या अंतिम वाक्य निष्कर्ष देता है? यदि तीनों उत्तर ‘हाँ’ हैं, तो उत्तर पूरा है।
आदर्श उत्तर — नमूना (अपने शब्दों में)
नमूना 1 — केंद्रीय भाव पर प्रश्न: ‘सहजोबाई के पद’ का केंद्रीय भाव यह है कि पाठ का मुख्य संदेश उसके छोटे-छोटे प्रसंगों से नहीं, बल्कि उनके आपसी संबंध से बनता है। ‘सहज’ इस संदेश की पहली कड़ी है — इसके बिना पाठ का तर्क आरंभ ही नहीं होता। ‘भक्तिन’ दूसरी कड़ी है — यह दिखाता है कि केंद्रीय भाव व्यवहार में कैसे प्रकट होता है। अंत में पाठ पाठक को एक स्पष्ट निष्कर्ष की ओर ले जाता है: जो बात सिद्धांत में कही गई है, उसे जीवन में भी अपनाना आवश्यक है। इसीलिए इस पाठ का अध्ययन केवल तथ्यों के लिए नहीं, बल्कि अपने दृष्टिकोण को परखने के लिए भी करना चाहिए।
नमूना 2 — मुख्य शब्द की व्याख्या पर प्रश्न: ‘सहज’ का अर्थ है — इस पाठ के प्रसंग में वह धारणा जो पूरे तर्क की नींव है। इसे समझने के लिए पहले इसका सामान्य अर्थ देखें, फिर पाठ में इसका विशेष प्रयोग देखें, और अंत में यह देखें कि इसके होने या न होने से पाठ की स्थिति में क्या अंतर पड़ता है। उदाहरण के लिए, यदि इस धारणा को हटा दिया जाए, तो पाठ का केंद्रीय तर्क अधूरा रह जाएगा, क्योंकि आगे के सभी बिंदु इसी पर टिके हैं। इसीलिए परीक्षा में इस शब्द का उत्तर परिभाषा, प्रसंग और महत्त्व — तीनों के साथ लिखना चाहिए।
एक नज़र में — तालिका
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| पाठ | सहजोबाई के पद |
| केंद्रीय भाव | पाठ का मुख्य संदेश — सार और ‘क्या सीखना है’ खंड से मिलाकर पढ़ें |
| मुख्य शब्द | सहज, भक्तिन, पांडित्य, पुकार, सरलता |
| पढ़ने की विधि | पहले केंद्रीय भाव, फिर शब्द प्रसंग सहित, फिर बिना देखे सार-लेखन |
| परीक्षा-फोकस | परिभाषा + प्रसंग + महत्त्व; लंबे प्रश्न में भूमिका, बिंदु और निष्कर्ष |
अतिरिक्त प्रश्न और उत्तर — गहराई से अभ्यास
- ‘सहज’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए और ‘सहजोबाई के पद’ में इसका महत्त्व बताइए।
‘सहज’ का अर्थ है — सरल, स्वाभाविक, बिना बनावट के।। ‘सहजोबाई के पद’ में यह शब्द इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि पाठ का केंद्रीय तर्क इसी धारणा से जुड़ा है। परीक्षा में इसका उत्तर लिखते समय पहले परिभाषा दें, फिर पाठ का प्रसंग बताएँ कि यह शब्द कहाँ और क्यों आता है, और अंत में एक वाक्य में इसका परिणाम या महत्त्व जोड़ें। परिभाषा, प्रसंग और महत्त्व — यही पूर्ण उत्तर की तीन कड़ियाँ हैं। - ‘भक्तिन’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए और ‘सहजोबाई के पद’ में इसका महत्त्व बताइए।
‘भक्तिन’ का अर्थ है — ईश्वर की भक्ति करने वाली स्त्री।। ‘सहजोबाई के पद’ में यह शब्द इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि पाठ का केंद्रीय तर्क इसी धारणा से जुड़ा है। परीक्षा में इसका उत्तर लिखते समय पहले परिभाषा दें, फिर पाठ का प्रसंग बताएँ कि यह शब्द कहाँ और क्यों आता है, और अंत में एक वाक्य में इसका परिणाम या महत्त्व जोड़ें। परिभाषा, प्रसंग और महत्त्व — यही पूर्ण उत्तर की तीन कड़ियाँ हैं। - ‘पांडित्य’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए और ‘सहजोबाई के पद’ में इसका महत्त्व बताइए।
‘पांडित्य’ का अर्थ है — शास्त्रों का गहरा ज्ञान।। ‘सहजोबाई के पद’ में यह शब्द इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि पाठ का केंद्रीय तर्क इसी धारणा से जुड़ा है। परीक्षा में इसका उत्तर लिखते समय पहले परिभाषा दें, फिर पाठ का प्रसंग बताएँ कि यह शब्द कहाँ और क्यों आता है, और अंत में एक वाक्य में इसका परिणाम या महत्त्व जोड़ें। परिभाषा, प्रसंग और महत्त्व — यही पूर्ण उत्तर की तीन कड़ियाँ हैं। - ‘पुकार’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए और ‘सहजोबाई के पद’ में इसका महत्त्व बताइए।
‘पुकार’ का अर्थ है — हृदय से की गई प्रार्थना।। ‘सहजोबाई के पद’ में यह शब्द इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि पाठ का केंद्रीय तर्क इसी धारणा से जुड़ा है। परीक्षा में इसका उत्तर लिखते समय पहले परिभाषा दें, फिर पाठ का प्रसंग बताएँ कि यह शब्द कहाँ और क्यों आता है, और अंत में एक वाक्य में इसका परिणाम या महत्त्व जोड़ें। परिभाषा, प्रसंग और महत्त्व — यही पूर्ण उत्तर की तीन कड़ियाँ हैं। - ‘सरलता’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए और ‘सहजोबाई के पद’ में इसका महत्त्व बताइए।
‘सरलता’ का अर्थ है — सीधापन, बिना कठिनाई के।। ‘सहजोबाई के पद’ में यह शब्द इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि पाठ का केंद्रीय तर्क इसी धारणा से जुड़ा है। परीक्षा में इसका उत्तर लिखते समय पहले परिभाषा दें, फिर पाठ का प्रसंग बताएँ कि यह शब्द कहाँ और क्यों आता है, और अंत में एक वाक्य में इसका परिणाम या महत्त्व जोड़ें। परिभाषा, प्रसंग और महत्त्व — यही पूर्ण उत्तर की तीन कड़ियाँ हैं। - ‘सहजोबाई के पद’ का केंद्रीय भाव अपने शब्दों में लिखिए।
‘सहजोबाई के पद’ का केंद्रीय भाव यह है कि पाठ का मुख्य संदेश उसके प्रसंगों और मुख्य शब्दों के आपसी संबंध से बनता है। सार खंड में दिए गए बिंदुओं को क्रम से जोड़कर, बिना मूल पंक्तियों की नकल किए, पाँच-सात वाक्यों में लिखें — पहले विषय का परिचय, फिर दो-तीन मुख्य तर्क या प्रसंग, और अंत में पाठ की सीख। जो उत्तर इस क्रम में लिखा जाता है, वह पूरा और संतुलित लगता है। - ‘सहजोबाई के पद’ से क्या सीख मिलती है? अपने जीवन से जोड़कर बताइए।
इस पाठ की सीख केवल परीक्षा के लिए नहीं, बल्कि दृष्टिकोण के लिए है — पाठ जो मूल्य या सिद्धांत प्रस्तुत करता है, उसे दैनिक जीवन के एक उदाहरण से जोड़कर देखें। उत्तर में पहले पाठ की सीख एक वाक्य में लिखें, फिर अपने जीवन का एक छोटा उदाहरण दें, और अंत में यह बताएँ कि उस सीख को अपनाने से क्या अंतर पड़ेगा। सीख और उदाहरण का यह जोड़ ही अच्छे उत्तर की पहचान है। - ‘सहजोबाई के पद’ के अध्ययन में विद्यार्थी सबसे बड़ी गलती क्या करते हैं?
सबसे बड़ी गलती है — केवल परिभाषाएँ और सार रट लेना, बिना प्रसंग समझे। ऐसा विद्यार्थी प्रश्न के शब्द बदल जाने पर उत्तर नहीं बना पाता। इससे बचने के लिए प्रत्येक शब्द को प्रसंग सहित पढ़ें, प्रत्येक अनुच्छेद के बाद ‘इसने केंद्रीय भाव में क्या जोड़ा’ पूछें, और अंत में बिना देखे सार लिखकर जाँचें। समझ के साथ पढ़ा गया पाठ ही परीक्षा में काम आता है। - ‘सहजोबाई के पद’ पर पाँच अंक का प्रश्न आए, तो उत्तर की रूपरेखा कैसी हो?
रूपरेखा इस प्रकार हो — भूमिका में एक वाक्य का परिचय, मुख्य भाग में तीन-चार बिंदु क्रम से, प्रत्येक बिंदु के साथ एक छोटा उदाहरण या परिणाम, और निष्कर्ष में एक वाक्य का संदेश। बिंदुओं को अलग-अलग पंक्तियों या अनुच्छेदों में लिखें, मुख्य शब्दों का सही प्रयोग करें, और मूल पाठ की नकल से बचें। यही रूपरेखा लंबे उत्तर को पूर्ण और पठनीय बनाती है। - ‘सहजोबाई के पद’ का सार बिना पुस्तक देखे कैसे लिखें?
पहले केंद्रीय भाव एक वाक्य में कहें, फिर मुख्य शब्दों को क्रम से याद करें और प्रत्येक शब्द से जुड़ा एक प्रसंग मन में लाएँ। फिर उन प्रसंगों को अपने शब्दों में पाँच-सात वाक्यों में जोड़ दें। जहाँ अटकें, वहीं समझ अधूरी है — उस अंश को दोबारा पढ़ें और फिर से लिखें। दो-तीन बार इस अभ्यास से सार बिना देखे भी पूरा लिखा जा सकेगा।
- सहजोबाई भक्ति-परंपरा की कवयित्री हैं।
- उनके पदों में सहज और सरल प्रेम है।
- भक्ति के लिए पांडित्य ज़रूरी नहीं है।
- सरलता भी एक बड़ी शक्ति है।
- परीक्षा में 'सरलता भी एक बड़ी शक्ति है' — यह विचार अवश्य लिखें।

