Chapter 13: राम बिनु बिरथे जगि जनमा, जो नर दुख में दुख नहिं मानै
राम के बिना यह जन्म व्यर्थ है — और सुख-दुख में समान रहना ही सच्ची साधना है।
Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 10 • Hindi • Book: Godhuli Bhag-2 (Purani pustak — 2025 se pehle wali)
राम बिनु बिरथे जगि जनमा, जो नर दुख में दुख नहिं मानै — EG के अपने नोट्स, सरल शब्दों में
पुस्तक: Godhuli Bhag-2 (Purani pustak — 2025 se pehle wali) (BSEB, Class 10) | पद्य खंड — अध्याय 1 | प्रकार: पद (गुरु नानक) | माध्यम: हिंदी
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चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): नदी-किनारे शांत बैठा व्यक्ति — भक्ति और धैर्य के भाव का एक सामान्य चित्र, किताब का दृश्य नहीं।

शांत मन से बैठा बच्चा — एक सामान्य चित्र।
इस अध्याय के बारे में
गुरु नानक के दो पद इस पाठ में संकलित हैं। प्रथम पद का केंद्रीय भाव यह है कि राम के बिना यह जन्म व्यर्थ है — नाम-कीर्तन के आगे अन्य कर्मकांडों की व्यर्थता सिद्ध की गई है। कवि ने अपने युग में धर्म-साधना के कई रूप देखे हैं — तीर्थ, व्रत, दान — और उन सबके आगे राम-नाम की महिमा को श्रेष्ठ बताया है।
द्वितीय पद का केंद्रीय भाव समता और निर्लिप्तता है — सुख और दुख में समान रहना, मान-अपमान से परे रहना, और कंचन को माटी जानना। गुरु की कृपा से ही उस युक्ति की पहचान हो पाती है, जिससे मनुष्य ब्रह्म में लीन हो जाता है — जैसे पानी में पानी मिल जाता है।
कविता में ब्रह्म का निवास हर जगह बताया गया है — वह किसी एक स्थान तक सीमित नहीं है। गुरु नानक के पद आज भी प्रासंगिक हैं, क्योंकि आज भी उपासना के प्रचलित रूपों में बाहरी आडंबर और आंतरिक साधना का अंतर बना हुआ है।
क्या सीखना है
दोनों पदों के केंद्रीय भाव, नाम-महिमा, समता और गुरु-कृपा की युक्ति को समझें।
मुख्य शब्द
- पद — भक्ति-कविता की एक विधा; गुरु नानक के भजन।
- नाम-कीर्तन — ईश्वर के नाम का गायन और स्मरण।
- हरिरस — हरि (ईश्वर) का रस — भक्ति का आनंद।
- गुरु-कृपा — गुरु की कृपा — जिससे युक्ति की पहचान होती है।
- कंचन — सोना; यहाँ भौतिक धन का प्रतीक।
- निर्लिप्तता — सुख-दुख और मान-अपमान से परे रहना।
याद रखें
- प्रथम पद: राम के बिना यह जन्म व्यर्थ है।
- नाम-कीर्तन के आगे अन्य कर्मकांडों की व्यर्थता।
- द्वितीय पद: सुख-दुख में समान रहना, मान-अपमान से परे।
- गुरु की कृपा से युक्ति की पहचान होती है।
- ब्रह्म का निवास हर जगह है।
गुरु नानक (1469–1539) सिख धर्म के संस्थापक और निर्गुण भक्ति धारा के महान संत-कवि थे। उनके पदों में नाम-महिमा, समता और निर्गुण ब्रह्म की साधना का भाव है।
पदों की व्याख्या में कविता की पंक्तियाँ हूबहू न लिखें — भाव अपने शब्दों में लिखें। उत्तर में 'राम के बिना जन्म व्यर्थ' और 'सुख-दुख में समता' — ये दो भाव अवश्य आएँ।
'आधुनिक जीवन में इन पदों की प्रासंगिकता' वाला प्रश्न अक्सर पूछा जाता है — उत्तर में बाहरी आडंबर बनाम आंतरिक साधना का अंतर लिखें।
Chart / Table: दो पदों के केंद्रीय भाव
| विषय | विवरण |
|---|---|
| प्रथम पद | राम के बिना जन्म व्यर्थ; नाम-महिमा |
| द्वितीय पद | सुख-दुख में समता; निर्लिप्तता |
| गुरु की भूमिका | कृपा से युक्ति की पहचान |
| ब्रह्म का निवास | हर जगह, किसी एक स्थान तक सीमित नहीं |
| आज की प्रासंगिकता | आडंबर बनाम आंतरिक साधना का अंतर |
अभ्यास — Practice set (स्वयं करके देखें)
- कवि किसके बिना जगत् में यह जन्म व्यर्थ मानता है?
संकेत: राम-नाम से सोचें। - वाणी कब विष के समान हो जाती है?
संकेत: नाम-विहीन वाणी से सोचें। - नाम-कीर्तन के आगे कवि किन कर्मों की व्यर्थता सिद्ध करता है?
संकेत: तीर्थ, व्रत, दान से सोचें। - कवि की दृष्टि में ब्रह्म का निवास कहाँ है?
संकेत: सर्वव्यापकता से सोचें। - आधुनिक जीवन में इन पदों की क्या प्रासंगिकता है?
संकेत: आडंबर बनाम साधना से सोचें।
प्रश्न और उत्तर
- इन पदों का केंद्रीय भाव क्या है?
केंद्रीय भाव यह है कि राम के बिना यह जन्म व्यर्थ है और सुख-दुख में समान रहना ही सच्ची साधना है। नाम-कीर्तन के आगे बाहरी कर्मकांड व्यर्थ हैं, और गुरु की कृपा से ही मनुष्य ब्रह्म में लीन हो सकता है। - प्रथम पद में कवि ने धर्म-साधना के कैसे रूप देखे हैं?
कवि ने अपने युग में धर्म-साधना के कई रूप देखे हैं — तीर्थ-यात्रा, व्रत, दान, बाहरी आडंबर। पर उनका मानना है कि नाम-कीर्तन के आगे ये सब व्यर्थ हैं, क्योंकि सच्ची साधना आंतरिक है, बाहरी नहीं। - हरिरस से कवि का अभिप्राय क्या है?
हरिरस से कवि का अभिप्राय हरि (ईश्वर) के नाम का रस है — वह आनंद, जो भक्ति से मिलता है। यह रस ही मनुष्य को जीवन की सार्थकता देता है। - गुरु की कृपा से किस युक्ति की पहचान हो पाती है?
गुरु की कृपा से उस युक्ति की पहचान हो पाती है, जिससे मनुष्य सुख-दुख में समान रहकर ब्रह्म में लीन हो जाता है — जैसे पानी में पानी मिल जाता है। यह युक्ति ही समता और निर्लिप्तता की साधना है। - इन पदों से क्या सीख मिलती है?
यही कि सच्ची भक्ति बाहरी आडंबर में नहीं, आंतरिक साधना में है — नाम-स्मरण, समता और गुरु-कृपा ही जीवन को सार्थक बनाते हैं।
पुस्तक के अभ्यास प्रश्न — बोध और अभ्यास (उत्तर सहित)
इस खंड में पुस्तक के ‘बोध और अभ्यास’ खंड के ‘पाठ के साथ’ / ‘कविता के साथ’ वाले 9 प्रश्नों के उत्तर EG के अपने शब्दों में दिए गए हैं। ‘पाठ/कविता के आस-पास’ और ‘भाषा की बात’ वाले कार्य कक्षा-कार्य के रूप में हैं — उन्हें अपने शिक्षक के साथ करें।
- कवि किसके बिना जगत् में यह जन्म व्यर्थ मानता है?
कवि राम के बिना जगत् में यह जन्म व्यर्थ मानता है। राम-नाम के बिना जीवन का कोई अर्थ नहीं है — नाम ही जीवन की सार्थकता है। - वाणी कब विष के समान हो जाती है?
वाणी तब विष के समान हो जाती है, जब उसमें राम-नाम नहीं होता। नाम-विहीन वाणी विष के समान है — वह मनुष्य को हानि पहुँचाती है, लाभ नहीं। - नाम-कीर्तन के आगे कवि किन कर्मों की व्यर्थता सिद्ध करता है?
नाम-कीर्तन के आगे कवि तीर्थ-यात्रा, व्रत, दान और अन्य बाहरी कर्मकांडों की व्यर्थता सिद्ध करता है। उनका मानना है कि ये कर्म नाम के बिना व्यर्थ हैं — सच्ची साधना नाम-स्मरण में ही है। - प्रथम पद के आधार पर बताएँ कि कवि ने अपने युग में धर्म-साधना के कैसे-कैसे रूप देखे हैं?
कवि ने अपने युग में धर्म-साधना के कई रूप देखे हैं — तीर्थ-यात्रा, व्रत-उपवास, दान-पुण्य, बाहरी आडंबर और कर्मकांड। पर वे इन सबको नाम-कीर्तन के आगे व्यर्थ मानते हैं। - हरिरस से कवि का अभिप्राय क्या है?
हरिरस से कवि का अभिप्राय हरि (ईश्वर) के नाम का रस है — वह आनंद, जो भक्ति और नाम-स्मरण से मिलता है। यही रस जीवन को मधुर और सार्थक बनाता है। - कवि की दृष्टि में ब्रह्म का निवास कहाँ है?
कवि की दृष्टि में ब्रह्म का निवास हर जगह है — वह किसी एक मंदिर, तीर्थ या स्थान तक सीमित नहीं है। ब्रह्म सर्वव्यापक है, वह हर जीव और हर स्थान में है। - गुरु की कृपा से किस युक्ति की पहचान हो पाती है?
गुरु की कृपा से उस युक्ति की पहचान हो पाती है, जिससे मनुष्य सुख-दुख में समान रहकर, मान-अपमान से परे होकर ब्रह्म में लीन हो जाता है — जैसे पानी में पानी मिल जाता है। - व्याख्या करें — प्रथम पद की पंक्तियों और द्वितीय पद की पंक्तियों के भाव अपने शब्दों में स्पष्ट करें।
इस प्रश्न में पदों की चार-चार पंक्तियों के भाव पूछे गए हैं। इनका भाव अपने शब्दों में इस प्रकार है: राम-नाम के बिना जीवन व्यर्थ है और मनुष्य भटकता रहता है; सोने को मिट्टी जानना ही निर्लिप्तता है — भौतिक धन का मोह छोड़ना; सुख-दुख और मान-अपमान से परे रहना ही सच्ची साधना है; और गुरु की कृपा से मनुष्य ब्रह्म में ऐसे लीन हो जाता है, जैसे पानी में पानी मिल जाता है। - आधुनिक जीवन में उपासना के प्रचलित रूपों को देखते हुए नानक के इन पदों की क्या प्रासंगिकता है? अपने शब्दों में विचार करें।
आधुनिक जीवन में भी उपासना के प्रचलित रूपों में बाहरी आडंबर और आंतरिक साधना का अंतर बना हुआ है। आज भी लोग तीर्थ, व्रत और बाहरी दिखावे को ही धर्म समझ लेते हैं, जबकि नानक के पद बताते हैं कि सच्ची साधना नाम-स्मरण, समता और आंतरिक शुद्धता में है — इसीलिए ये पद आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।
- कवि गुरु नानक; दो पद।
- प्रथम पद: राम के बिना जन्म व्यर्थ; नाम-महिमा।
- द्वितीय पद: सुख-दुख में समता; निर्लिप्तता।
- गुरु-कृपा से युक्ति की पहचान; ब्रह्म सर्वव्यापक।
- आज भी प्रासंगिक: आडंबर बनाम आंतरिक साधना।
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